चिरैया….
भोर काले चहकती चिरैया,
कानों में निर्मल रस घोलती.
अपने गान से सोये को जगाती,
झील से तिनके को भी निकल लाती.
रोज सबेरे, आंगन में फुदकती आती,
जैसे हो कोई बात मुझसे बतानी .
कभी इस डाली, कभी उस मुंडेर पर,
पानी के मटके पर तो कभी दाने पर.
रंगों से सराबोर, उर्जा की प्रदर्शनी,
कितनी मनमोहक ये सुदर्शन बाला.
इस पल में रहती बस, बीते को भूलती ,
बचपन होती इक पल, जल सी डोलती.
सोचा कभी किस कारज के लिए है ये,
फूल चुनती,डाली-डाली फल कुरेदती.
जोड़े से उडती फिरती, घोंसला बनाती,
श्रम करती नवजात को दाना खिलाती.
बड़ा करती शिशु को, उड़ना सिखाती,
घोंसला छोड़, फिर संतान को त्यागती.
खुले आसमान में स्वछन्द विचरने को,
और फिर भूल जाती अपने रक्त को.
जैसे कहती हो लायी हूँ संदेश,
तुम्हारे प्रभु के निर्मल ह्रदय से.
भक्ति का मोहक पाठ पढ़ाती,
मंदिर मस्जिद में न भेद कराती.
निराकार की पुजारन कुछ ऐसी,
बिना पूजा, इश कारज करती.
साधना में लीन साधू की तरह,
साधन साध्य को भूले रहती
प्रकृति का यह अलंकार है,
संदेश है, नहीं कोई अहंकार है.



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