DM vs MD

कलेक्टर विरुद्ध डॉक्टर – तंत्र बीमार

भरी सभा में अपने साथी डॉक्टर को डांट देना भी एक पीड़ित कला है जहां पक्ष और विपक्ष दोनों पीड़ित हो जाते हैं. अभी हाल ही में कोरोना महामारी के संबंध में आयोजित एक महती और बड़ी बैठक में भरे कॉन्फ्रेंस हॉल में जिला कलेक्टर आंध्र प्रदेश ने भरी सभा में प्रभारी स्वास्थ्य सेवा अधिकारी (एमडी) को डांट दिया. डी एम का कार्य होता है दिशा देना, निर्णय थोपना और एक अनिवार्य भय का माहौल बनाए रखना ताकि कार्य निर्विध्न रुप से संपन्न होते रहे, लॉ एन्ड ऑर्डर की स्थिति बनी रहे, राजस्व की पूर्ति होती रहे और शहर का अमन चैन कायम रहे.

कुछ मातहत कर्मचारी-अधिकारी कोशिश करते हैं कि डीएम की कृपा दृष्टि से संपन्न होते रहे और बचे हुए कर्मी इस कोशिश में रहते हैं कि डीएम की कुदृष्टि से बचे रहें और इस हेतु डीएम का कर्तव्य हो जाता है कि वे डांट- शास्त्र के द्वारा समस्त कार्य शांतिपूर्ण निर्विघ्न रुप से संपन्न कराते चलें.

डांट शास्त्र विचित्र निम्न गामी प्रवाह है जो नदी की भाति है जो सदैव ऊपर से नीचे की ओर ही बहता है. डांट यदि सूने और बंद कमरे में अकेले में दी जाए तो सम्मान अपनी सुधार की गति को बनाए रख, नए उत्साह से आगे बढ़ कार्यशील हो सकता है परंतु भर-सभा में डांट का शास्त्र केमिकल रिएक्शन की भांति अपमान तो पीता ही है और तो और अपमान उड़ेलता भी है। क्रोध भी पैदा कर लेता है जब अपमान हो जाए तो कार्यकुशलता द्वेष और घृणा के द्वारा षड्यंत्र और पलायन को भी उन्मुख हो जाता है. अतः डांट शास्त्र में एम.ए. की डिग्री भले ना होती हो, जीवन शास्त्र के नए आयाम दिखाता है. बेटे को मां की डांट, प्यार का विस्तार लगता है और अफसर की अफसर को डांट अपमान का कड़वा घूंट होती है. ऐसा ही कड़वा घूंट पीया पब्लिकली एक डॉक्टर ने कलेक्टर की डांट से जिससे तंत्र के दोनों ही पहिये मलिन हो गए.

कोरोना की यह महामारी, महाकाल की कुदृष्टि बन आयी है जिसका रामबाण-तोड़ या उपचार पूरे विश्व में कहीं भी पकड़ नहीं आ पा रहा है. न वैक्सीन उपलब्ध है, न दवाई दिखाई पड़ रही है और ना कोई फुलप्रूफ उपचार ही उपलब्ध है. इस रोग के नियंत्रण के लिए रोकथाम करने के लिए ले देकर जो उपागम उपलब्ध है वह लॉकडाउन, क्वारेंटीन, मास्किंग, सेनिटाइजरऔर आपस में दूरी का विचित्र पालन ही है। जैसे सब अधिकारी और डॉक्टर, आंख में पट्टी बांधे कभी भी ना देखे गए एक विचित्र हाथी जैसे बड़े जानवर की व्याख्या करने का प्रयास कर रहे हो.

ऐसा ही प्रयास समस्त प्रशासनिक अमला और मशीनरी करने का प्रयास कर रहे हैं. और करोना जब तक दूर है तो ऑक्सीजन वायुमंडल में पर्याप्त उपलब्ध है और जो कोरोना से पीड़ित हो जाए तो पहले तो ऑक्सिजन सिलेंडर से प्राण वायु लो फिर हालात बिगड़े तो हाई फ्लो तक पहुंचाया फिर वेंटिलेटर तक. ऐसे में जब सरकारी अस्पताल दशकों से चरमराई व्यवस्था से पीड़ित हो याने वार्डों में बिस्तर नहीं, ऑक्सीजन सिलेंडर नहीं, सिलेंडर है तो उन में ऑक्सिजन नहीं. ऑक्सिजन सप्लाई करने वाला व्यापारी तैयार खड़ा हो तो सरकार के पास बजट के पैसे नहीं.

डीएम का क्रोध ऐसी परिस्थितियों का निरंतर श्रवण है और एमडी डॉक्टर का उत्तर प्रतिउत्तर करते हुए कोप भाजन का शिकार हो जाना अत्यंत ही स्वाभाविक है. डीएम ने भी आवेशित हो, डॉक्टर को तुरंत निलंबित करने का फरमान सुना दिया. पुलिस में रिपोर्ट लिखाने का आदेश कर दिए.

तंत्र की कमी का दोषी व्यक्ति पर अधिरोहित करना क्रोध का निर्गमन हो सकता है परंतु तंत्र को तो लकवाग्रस्त होना ही रहेगा क्योंकि व्यक्ति निलंबित हो कर चला गया तो दूसरा आएगा जो उस लटकती तलवार के नीचे खड़ा होगा और वह भी पुनः उसी प्रकार पीड़ित होगा. जादू की छड़ी नहीं बल्कि बजेट आवंटन और पारदर्शिता के साथ की व्यवस्था स्थापित करना शायद एक बेहतर उपाय हो सकता है. कमोबेश हास्यास्पद स्थिति और है जब डीएम के कोप का भाजन मातहतों को होना पड़ता है ऐसी स्थिति में मातहत भी “प्ले सेफ़” अर्थात “सुरक्षित खेलों”, के तहत आंकड़े प्रस्तुत करने लगते हैं और “सब ठीक है” का हमिंग उद्घोष वायुमंडल में गूंजने लगता है जबकि राजनीतिक पर्यावरण और सामाजिक परिदृश्य सबको पता रहता है कि इस तंत्र की कमी जो सदियों से है उसका कुछ नहीं हो सकता है.

डीएम परेशान है तो एमडी भी उतने ही परेशान…. डीएम क्रोधित हैं तो एमडी भी उतने ही क्रोधित हैं…. डीएम निर्णय को कागज से धरातल पर साकार करने को बेचैन है तो एमडी भी पालन हेतु बेचैन है….
डीएम स्टाफ के काम करने की गति से पीड़ित हैं तो एमडी तो स्टाफ की ही कमी से पीड़ित हैं ….
डीएम डॉक्टर्स के कार्यशैली से दुखी हैं तो एमडी भी 16-16 घंटे काम करके दुखी हैं ….
डीएम फ्रंटलाइन योद्धा नायक हैं तो एमडी डॉक्टर भी फ्रंटलाइन कोरोना योद्धा हैं…..
डीएम कार्य उम्मीद से आहत हैं तो एमडी भी कार्य में अनिश्चितता के बोझ से दबे हैं….
डीएम गणितीय नियम से कार्य करा लेना चाहते हैं जबकि हम भी डॉक्टर समझा नहीं पा रहे हैं कि चिकित्सा विज्ञान में 2 धन दो = चार हमेशा नहीं हो पाता है .
डीएम को राजनेता को जवाब देने होते हैं वहां डांट खाना पड़ती तो एमडी भी उसी नाव पर सवार होते हैं ….

कमोबेश दृश्य मलिन है और डांट अवश्यम्भावी है और डाँट की धमकी या निलंबन के उद्देश्य के पीछे जो कार्य सुचारु रुप से संपन्न होने की धारणा है वह मृत हो जाती है. डीएम या उनका मातहत स्टाफ अंग्रेजों के शासन शैली को साथ लेकर सहयोगात्मक रुख से कार्य करें तो सूरत बदल भी सकती है….

इति डांट अध्याय समाप्तम

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