नदी होना चाहता हूं
गोमुख से छोटा उदगम
पवित्र और पावन
जीवन नद का निर्मल
नदी का उत्तम उदभव
कुछ इठलाती नटखट
समेटे सबको जाती
बाहों को फैला लेती
सब को नहला जाती
है दान पुण्य की हामी
प्यासे की अनुपम दासी
प्यासे का रंग ना देखती
सदियों से सेवा को प्यासी.
समभाव से बहती
निर्मल यह कामिनी
प्राणों की रक्षा में
प्रेम की यह दामिनी
जीव सहेजती खेत सींचती,
नहर भरपूर पूरती,
नदी में वह बात है
नहीं किसी को भूलती.
संत भाव से गंद समेटती
और जैसे बहता समय,
शिवाले सी अनंत
बहना इसका पलपल.
सूर्य की भेंट को समर्पित
धरती की अनमोल धाती
कभी सूख जाती तो
कभी विकराल बाढ़ लाती
किनारे नम उसके दोनों
और दो अंत भी नम
दिशा पकड़े जो चली
तो सागर को मिलन
सरस्वती सी लुप्त
धारा में समाई है
अनादिकाल से नदी में
अद्भुत ऊर्जा समाई है
होकर भी लुप्त रहना,
नदी की प्रकृति है.
ऐसे ही सत्कर्म कर,
मुझे होना निवृत्ति है.
रमण रेती की यमुना
गंगा का अस्सी घाट
गोदावरी का बेसिन
तो क्षिप्रा का रामघाट.
नर्मदा की परिक्रमा अमोघ,
गंगा का सुंदरबन
चम्बल का ताप अद्भुत
साबरमती का चितवन
कावेरी का जल विवाद,
ब्रह्मपुत्र का जल विस्तार
महानदी का हीरासागर,
सतलज सिन्धु हिम पार
जल उर्जा का रूप अभिन्न,
अंजुली में संभल लेना
पल पल जीवन इससे.
मलिन न होने देना.
धारा कभी सहस्त्र या एकल
शांत कभी तो क्रोध विकराल
करुणा भाव से पूज लो
अमृत बहता जैसे महाकाल .
क्यों कहे कि सहेज लेना,
नदी जीवन का आधार
सदियों से यह पावन
संततियों की धरोहर.
स्वच्छ रखना जैसे चरित्र,
नदी समाज की सम्पदा है.
जो नहीं माने यह सत्य,
तो आनी निश्चित आपदा है.
चाह, मेरी भी नद होना,
कलकल बहना चाहता
शांत मन का संत भाव
मुझे अविकल समंदर होना.

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