पत्थर से भी मांगते….
भटकते हम,
सदा कुछ पाने को.
भूखे प्यासे,
सदा कुछ भूलने को.
कभी ये तो,
कुछ वो बहुत, को
मिल जाये,
तो भी नहीं रुकने को.
संतोष नहीं,
ये लालसा अविनाशी है.
लगता कभी,
क्या हम सब भुतिया हैं.?
क्या होना,
इसकी अंतहीन दौड़,
सोचते सदा,
क्या हम डरपोंक भी हैं.?
डरते सदा,
पत्थर से भी मांगते.
पूछा सही,
क्या हम वाकई धार्मिक हैं?.
किसी भी कीमत,
चाहूँ सफलता का हार
मन विचारे,
क्या हम थोड़े भी नैतिक हैं?
ये नहीं, वो
मायाजाल के हामी हम.
मानो ना मानो,
क्या हम सदा भौतिक हैं?
प्रेम भूले,
मोह का व्यवसाय करते.
स्वार्थ सिद्ध हो,
न जाने कैसे सेवाभावी हैं.
जटिल हैं हम,
नकली के सदा ग्राहक
भूले सब,
क्या हम थोड़े भी प्राकृतिक

Leave a comment