क्षण प्रतिक्षण है क्षीण क्षण…
आखिर कौन हूँ मैं,
क्या मात्र यही एक क्षण.
आखिर कहाँ ठहरा हूँ मैं,
क्या यहीं इसी क्षण में.
आखिर मैं काहे को हूँ यहाँ,
इसी क्षण को जीने को.
तो क्या है ये क्षण,
क्षणिक है या अति है ये क्षण.
आखिर क्या है जो बीत गया,
बस यही इक क्षण.
जो समझेगा, इस क्षण को
तो आगे बढ़ना जायेगा.
क्षण के पीछे लगा है क्षण,
परम तत्व है ये क्षण.
तत्क्षण क्षीण होने से बच,
क्षण में अनमोल होते चल.
अनजान अँधेरे में द्रष्टि रख,
क्षण क्षण आगे बढ़ना है.
कर्म का प्रति-क्षण पाठ उठा,
फल को क्षणिक न सोच.
जादू बिखरा है क्षण क्षण में,
लीला घनघोर क्षण क्षण में.
जो तू लीन होगा क्षण में,
भोग भी मात्र सपना होगा.
और जो त्याग को भी माना सपना,
तो क्षण क्षण का स्वयंभू प्रभु होगा.
आत्मा के चहुओर है माया का घेरा,
कलियुग का क्षण भुलाना होगा.
और जो की, दुरूह अंतर्मन की यात्रा,
होगा क्षण प्रतिक्षण मनभावन.
क्षण-क्षण है दृष्टि, क्षण-क्षण है दृष्टा,
क्षण क्षण है ये जगत भी द्रश्यमान.
प्राण क्षण को हैं, उर्जा शाश्वत,
क्षण तजो तो भवसागर पार.

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