लोन दान या दान का लोन
….पूछ बैठी एक दिन पत्नी मेरी यह एन.पी.ए. क्या होता है?
….. कह ही दिया मैंने, यह एक प्रकार का दान होता है ऐसा दान जो छीन कर लिया जाता है. ऐसा दान जो शीर्ष सत्तके सीने पर मुक्के मार कर बैंक की चेस्ट से लोन के रूप में निकाल लिया जाता है और वापस जमा नहीं किया जाता है. चतुर सुजान द्वारा बैंक में वापस बिना ब्याज या ब्याज समेत कतई जमा नहीं किया जाता है याने प्रभु का नाम जपना ओर सज्जनों का माल अपना।
लोन को दान की परिभाषा में कैसे बोल सकते है…. वह भी अपने अल्पज्ञान से वाद विवाद प्रतियोगिता में प्रतिभागी हो गयी।
दान का भी एक मर्म होता है और दान उसी प्रकार से दिया जाता है जिस प्रकार की आदमी की अपनी साख होती है, शुद्ध देशी भाषा में कहूं तो जैसी औकात होती है वैसा दान। सड़क किनारे ट्रैफिक सिग्नल पर ₹1 या ₹5 का दान देने वाला अपनी तो अपनी, सामने वाली की भी औकात पहचान के दान देता है। जैसी औकात वैसा दान का प्रावधान पुराण है। अनाथ बच्चों के लिए, अपनी कार में रखकर बिस्कुट के पैकेट चलते हैं वह दान देते चलते हैं और कुछ सुधिजन बच्चों के नंगे पैर देख उनको चप्पलों का भी दान करते हैं लेकिन सबसे अद्भुत दान होता है जो डरा कर धमका के सत्ता के दबाव से बैंकों द्वारा लोन के रूप में प्राप्त किया जाता है और यह हजारों करोड़ में होता है । पूरा देश और समाज मेहनत करके जो पैसा बैंकों में रखते हैं वह पैसा बाहुबल से, सत्ता शक्ति से चंद बड़े लोगों या उद्योगों को सहर्ष दान में लोन के स्वरूप में दे दिया जाता है जो आगे पुनर-भुगतान ना होने से बेड-लोन में बदल जाता है अर्थात अघोषित दान हो जाता है और यह लोन-दान बड़ा अद्भुत दान होता है इसमें बैंक तो बैंक, जिसका पैसा गया वह नागरिक और समाज के साथ- साथ तंत्र की साजिश होने की जानकारी होने के बावजूद कोई कुछ नहीं कर पाता । इस लोन रूपी दान को बट्टे-खाते में प्रदर्शित कर दिया जाता है और यह दान काल कवलित हो जाता है । कालांतर में यह तो सिर्फ स्वीकार करने वाली बात रह जाती है । जो सक्षम होते हैं समर्थ होते हैं उन्हें और भी कई तरह के दान प्राप्त हो जाते हैं।
दान भी समाज के विशिष्ट खूबी है, और जो दान प्रचलन में हैं जो गाहे-बगाहे खूब गाए जाते हैं, कहे जाते हैं वह है विद्यादान, कन्यादान, रक्तदान, मतदान अन्नदान, वस्त्र दान और समय दान । दोस्ती की पहली परिभाषा में समय दान का विशेष स्थान है जबकि अन्य जितने भी दान हैं रक्तदान वस्त्र दान अन्न दान आदि वह आपके अतिरिक्त प्रदाय के छोटे से हिस्से में से किया जाने वाला दान है ।
और सबसे कठिन और दुर्लभ दान है सर्वस्व दान, समाज की कुछ रीत ऐसी हो गई है कि दान का भी बढ़ा नाटक प्रदर्शित किया जाता है जिससे दान देने वाले का महिमामंडन हो और समाज में उसकी साख एवं धर्म परायणता समाज उद्यमिता बलवती हो ताकि वह दानवीर के नाम से अपना भविष्य और सत्ता देश में अपना स्थान कायम कर सके। एक विशेष दान का यहां उल्लेख किया जाना अनुचित नहीं होगा और वह है रिश्वत दान यह साधन है जो देने के पहले तो मन कसमसा कर सहमति बनाई जाती है और देने के बाद आदमी मन के संतोष को एक स्तर पर लाकर इस दान का पटाक्षेप कर देता है और इस विशिष्ट दान ने भ्रष्ट आचरण का वह मकाम कायम कर दिया है कि कार्य संपन्न होने की आशा में इस दान का पालन कमोबेश सत्ताधीशों और आम नागरिक के मध्य खूब फल फूल रहा है. व ैसे तो सभी दान सद्भावना से पूरित होते हैं फिर भी दान को दो श्रेणियों में रखा जा सकता है सज्जन दान और दुर्जन दान। दुर्जनदान खतरनाक है जो सत्ता और लोभ के अति संगम या भय के द्वारा लोन रूप में कुपात्र को दे दिया जाता है और यह दुर्जन दान ही है जो लोन का रूप धर मारीच की भांति अलोपीदीन हो जाता है।

Leave a comment