मानव शरीर अनुशासन का हामी है और इस मानव शरीर में एक विचित्र अंग उपस्थित है, अग्नाशय, जिसे संभावित रूप से सबसे अधिक अनुशासन की आवश्यकता होती है. अग्नाशय या अंग्रेजी में पैनक्रियाज एक ग्रंथि है जो आमाशय के पीछे रीढ़ की हड्डी के सामने एक अल्पविराम के निशान की भांति उपस्थित हैं। अग्नाशय, एक अनुशासित सैनिक की भाँति दिन रात कार्य कर भोजन पाचन में सहायक द्रवों का उत्पन्न तो करता ही है, वह आपके दैनिक भोजन से प्राप्त कार्बोहाइड्रेट यानी ग्लूकोज श्रेणी के विभिन्न घटकों का समुचित प्रबंधन करने के लिए दो अतिमहत्वपूर्ण ग्लूकागॉन तथा इंसुलिन नामक हार्मोन का उत्पादन भी करता है। लगभग 100 ग्राम वजनी, मुट्ठी भर की आकार की इस अनुशासित ग्रंथि का स्वभाव आपके खानपान की शैली से बिगड़ जाए तो यह उस सैनिक की भाँति व्यवहार करना शुरू कर देती है जिसकी छुट्टी नामंजूर कर दी गई हो और उसके हाथ में गोलियों भरी हुई बंदूक हो। एक बार अग्नाशय विचलित हो जाए तो इसके हार्मोन का उत्पादन कम होता जाता है और मधुमेह जैसी जटिल बीमारी घर कर जाती है।
आपके भोजन का पाचन और ग्लूकोज का भक्षण करने में यह ग्रंथि एक प्रतिबद्ध सैनिक की भाँति रक्षा को सदैव उपस्थित रहती है, परंतु जीवनशैली में परिवर्तन के चलते पेंक्रियाज के सामान्य कार्यप्रणाली पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। किंतु इंसुलिन के उत्पादन में कई सूक्ष्म तत्व अल्प मात्रा में आवश्यक होते हैं जो आधुनिक भोजन शैली के फास्ट फूड, जंक फूड से प्राप्त नहीं होते हैं और आलस भरी जीवनशैली के होने से भी अग्नाशय पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और मधुमेह जैसा लाइलाज रोग घर कर जाता है।
पूरे विश्व में नागरिको की जीवनशैली में बड़े अभूतपूर्व परिवर्तन आए हैं। बच्चे-बड़े, जवान-बूढ़े, नर-मादा, खिलाड़ी-आलसी, स्वस्थ-रोगी, सभी श्रेणी के लोग विभिन्न शारीरिक और मानसिक व्याधियों से ग्रसित है। और सम्भवतः शिक्षा, करियर, व्यवसाय और नौकरी के तनावों से शरीर विश्राम की अवस्था में नहीं आ पाता है और तनाव एक अनजान और असामान्य अवस्था में बना रहता है। संभावना है कि तनाव की स्थिति में निरंतर बने रहने के जटिल कारणों से शरीर में एक विषपाई स्थिति बन जाती है जो अच्छे किस्म के हार्मोन के स्त्रावण को रोक देती है और जिसके कारण शरीर के स्वास्थ्य की विपरीत परिस्थितियां घर कर जाती है, जिसमें मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, अवसाद, थायराइड रोग, तंत्रिका रोग, हृदय रोग इत्यादि पनप जाते हैं।
14 नवंबर रोग-विशेष दिवस के रूप में संयुक्त राष्ट्र द्वारा मधुमेह नामक लाइलाज रोग को समर्पित है ताकि बढ़ती उम्र के साथ बच्चे बड़े बूढ़े अपने शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हों और सही भोजन, सही व्यायाम और सही जीवनशैली के माध्यम से नागरिक अपने स्वास्थ्य का स्वयं ध्यान रख मधुमेह का बेहतर नियंत्रण कर पाए।
आखिर क्या है मधुमेह?
शरीर को चलाने के लिए लगने वाली ऊर्जा को भोजन से प्राप्त किया जाता है जिसमें प्रोटीन शर्करा वसा तथा अन्य तत्व जैसे मिनरल्स, विटामिन इत्यादि सम्मिलित होते हैं। शरीर को ऊर्जा प्रदान करने में शर्करा का विशेष स्थान है। शक्कर की अतिरिक्त मात्रा यदि रक्त में उपस्थित हो तो वह वसा में परिवर्तित हो जाती है जो बैंक के लॉकर में जमा राशि या जेवर की भाँति जमा होती जाती है। रक्त में बहती इस शर्करा का प्रबंधन इन्सुलिन नामक हॉर्मोन के हाथों में है जो बिगड़ जाए तो मधुमेह रोग हो जाता है। यह प्रबंधन शर्करा के नियंत्रणकारी हार्मोन के इंसुलिन की पैदावार में कमी होने से होता है जो हार्मोन्स पैदा करने वाली इस अन्तःस्त्रावी ग्रंथि याने पेनक्रियाज में उपस्थित विशिष्ट कोशिकाओं से छूटता है, और रक्त में शर्करा की प्रविष्टि सुनिश्चित करता है. ६०० अरब से भी अधिक कोशिकाओं मे कम इन्सुलिन तो रक्त में उच्च स्तर पर भोजन से प्राप्त कार्बोस या शर्करा का रक्त में उच्च स्तर पर बना रहेगा।
इंसुलिन की कमी होने से कई कारण हो सकते हैं जो अनुवांशिक मोटापा ऑटोइम्यून रोग, अथवा ट्यूमर जैसे रोग हो सकते हैं। शरीर की ऊँचाई को एक आयु के बाद बदला नहीं जा सकता है, परंतु शरीर का भार निश्चित रूप से परिवर्तनशील है जिसे संतुलित आहार, नियमित व्यायाम से नियंत्रण में रखा जा सकता है। ज्यादा भार हो तो अधिक इंसुलिन हार्मोन की आवश्यकता होगी। संतुलित वजन होने पर कम मात्रा का इंश्योरेंस प्रवाह हो तो भी मधुमेह का प्रभावी नियंत्रण लंबी और सवस्थ आयु प्रदान कर सकता है। हृदय, लिवर, किडनी में उच्च शक्कर से होनेवाले हानि के प्रभाव को लंबे समय तक टाला भी जा सकता है।
क्या है मधुमेह बिमारी के लक्षण?
मधुमेह की बीमारी को भारत के नागरिको में बड़ा स्थान मिला है और थकान, कमजोरी, वजन में कमी, चक्कर इत्यादि की सामान्य शिकायतों में भी चिकित्सक ब्लड शुगर की जांच की अनिवार्य सलाह देते हैं। यह उचित भी है क्योंकि यह सोचने का विषय है कि सभी भारतीय मधुमेह रोग से पीड़ित होने के सम्भावना है। लक्षणों की बात करें तो किसी भी आयु,लिंग,व्यवसाय,नौकरपेशा के मधुमेह के विभिन्न स्तरों से पीड़ित होने की स्थिति भिन्न होती है। स्थापित मधुमेह के लंबे समय तक उच्च स्तर पर रक्त शर्करा का स्तर बने रहने से शरीर के अवयव धीरे धीरे क्षतिग्रस्त होते जाते हैं, तब प्रत्येक नागरिक को लक्षणों को पहचानना जरूरी है।
जैसे-
लंबे समय की कमजोरी.
अकारण वजन का घट जाना.
अधिक भूख का महसूस होना.
थोड़े श्रम पश्चात अधिक थकान.
पानी की प्यास अधिक लगना.
बार बार मूत्रालय को जाना.
जल्दी जल्दी संक्रमण होना.
त्वचा या जननांगों में खुजली होना.
चश्मे का नम्बर जल्दी जल्दी बदलना.
घावों का देर से भरना.
धुंधला दिखाई पड़ना.
पैरों युवा हाथों में सुन्नपन होना.
पैरों हाथों में झुनझुनाहट होना
नपुंसकता हो जाना.
नाखून में या पैरों की उंगलियों के मध्य फफूंद का संक्रमण.
मूत्रमार्ग में संक्रमण होने से जलन, दर्द इत्यादि.
बच्चों में चिड़चिड़ापन, सिर दर्द या व्यवहार में परिवर्तन,
पेट दर्द के अतिरिक्त लक्षण भी दिखाई पड़ते हैं।
कई प्रकरण में लक्षण दिखाई नहीं पड़ते हैं और बरसों बरस निकल जाते हैं क्योंकि मधुमेह की बिमारी का आतंक इतनी धीमी से होता है कि लक्षण पहचान नहीं पाते हैं। कई बार मधुमेह से उत्पन्न जटिलताओं को लेकर रोगी, चिकित्सक के पास आते हैं जब आमतौर पर अधिक शक्कर के स्तर से रक्त वाहिनियां कमजोर हो जाती है जो किडनी, आँखों, तंत्रिका तंत्र, हृदय, मस्तिष्क की सामान्य कार्यप्रणाली को विपरीत रूप से प्रभावित कर देती है। इसके अतिरिक्त पुरुषों में यौन संबंधी पौरुष में कमजोरी या नपुंसकता. स्त्रियों में योनि संक्रमण या अन्य संक्रमण जैसे ट्यूबरकुलोसिस, हर्पीस जैसे रोग भी हो सकते हैं, जो लक्षण के रूप में मधुमेह के निदान में सहायक हो सकते हैं।
मधुमेह के लिए कौन सी जांचे कराना है?
मधुमेह के शत प्रतिशत निदान के लिए स्वर्ण मानक के स्तर की पैथोलॉजी जांच “ओरल-ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट” मानी जाती है। हालांकि अब बेहतर और त्वरित कार्ड टेस्ट एच बी ए-1-सी का अधिक उपयोग होता है जो सही डायग्नोसिस के साथ साथ रोगी के पिछले तीन माह के रक्त में शर्करा के औसत स्तर को भी बता देता है। ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट में 75 ग्राम ग्लूकोज का पाउडर 300 मिली-लीटर पानी के साथ लिया जाता है। इसके पश्चात रक्त में शर्करा की जांच 0,30,60,90 तथा 120 मिनट के अंतराल पर पांच बार परीक्षा की जाती है. ओ.जी.टी.टी. की जांच सामान्य रूप से सक्रिय और असंक्रमित व्यक्ति के लिए उपयोगी है। ग्लूकोमीटर एक कार्ड टेस्ट का उपकरण है जिसमें ग्लूकोस्ट्रीप लगाकर रक्त की एक बूंद से कैपिलरी स्तर पर रक्त में बहने वाली शर्करा का स्तर जाना जाता है। मधुमेह के निदान के लिए मूत्र की जांच भी घर बैठे यूरो स्टिक्स द्वारा की जा कर शर्करा की मूत्र उपस्थिति को पकड़ा जा सकता है। सामान्य व्यक्ति की खाली पेट यानी फास्टिंग शुगर 100 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर से कम, भोजन के 2 घंटे बाद 140 मिलीग्राम प्रति डेसी लीटर से कम हो तो मधुमेह का रोग नहीं हैं या मधुमेह के रोगी का नियंत्रण प्रभावी है।
किसी भी स्थिति में साल में एक बार मधुमेह रोगियों ए-1-सी की जांच अवश्य कराई जानी चाहिए ताकि आपके गत तीन माह की रक्त शर्करा का स्तर ज्ञात हो सके। मधुमेह के स्थापित रोगियों को ए-1-सी की जांच के साथ साथ नेत्रज्योति, किडनी, लिवर की जांच के साथ अपने ब्लड प्रेशर, पैरों में तंत्रिका तंत्र की जांच कराने, मधुमेह से होने वाले दूरगामी दुष्परिणाम यह जटिलताओं का आरंभिक स्तर पर ही पहचाना जा सकता है ताकि पैरों में छाले, हृदय रोग, लिवर के रोग और किडनी के कार्यों को सुगम बनाए रखा जा सके.
क्यों नहीं हैं मधुमेह से जड़ मूल से उपचार?
मधुमेह के कारक तत्वों में अनुवांशिक तथ्यों के अतिरिक्त मोटापा, आलसी जीवनशैली, सुख सुविधा से भरे जीवन में व्यायाम का अभाव या ऐसी महिला हैं जिन्होंने चार किलोग्राम के बच्चे को जन्म दिया हो। इन सभी परिस्थितियों में से आनुवांशिक तत्वों को नियंत्रित नहीं किया जा सकता है, परंतु मोटापा, आलसी जीवनशैली को निश्चित ही नियंत्रित किय्सा जा सकता है. एक बार इंसुलिन नामक हार्मोन की मात्रा शरीर में कम हो जाए तो शरीर से समझौता करने लगता है।
मधुमेह के प्रकारों में से एक टाइप-1, मधुमेह में संक्रमण होने से पैंक्रियास की कार्यक्षमता शून्य तक हो जाती है जो आमतौर पर बच्चों में होती है. तभी उन्हें बचपन से ही इंसुलिन के इंजेक्शन लगाकर रक्त शर्करा को नियंत्रित किया जाता है. टाइप- 2 के विभिन्न प्रकारों में ऑटोइम्यून इंसुलिन की कमी, इंसुलिन के प्रति शरीर का प्रतिरोध, स्थूल-काया मधुमेह, आयु आधारित मधुमेह जैसी श्रेणियाँ हैं जो रोगियों के साथ साथ चिकित्सकों को भी अनिवार्य दिमागी कसरत करा देती है। अग्नाशय या पेनक्रियास विचित्र अंग है, जो कई हार्मोन तो बनाता ही जो रक्त शर्करा बढ़ाने व घटाने का कार्य करते हैं साथ ही इसके हार्मोन भोजन पचाने में भी सहायक होते हैं। अग्न्याशय एक ऐसा भंगुर अंग है जो किसी भी उत्तेजक तत्व के संपर्क के प्रति अति संवेदनशील होता है. संक्रमण होने की दशा में यह ग्रंथि निष्प्रभावी हो मधुमेह की स्थिति उत्पन्न कर देती है। गठान या ट्यूमर उत्पन्न हो जाए तो यह अग्नाशय अत्यधिक इंसुलिन पैदा करने की विचित्र रोग स्थिति भी उत्पन्न कर सकता है.
कैसे हो प्रभावी उपचार एवं समुचित नियंत्रण?
भोजन, व्यायाम और औषधि सेवन के त्रिकोणीय ढांचे के मध्य मधुमेह का उपचार टिका है. हर स्थिति में रोगी जब मधुमेह की आरंभिक स्थापित नियंत्रित, अनियंत्रित या जटिल अवस्था में हो तब भी संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक व्यायाम और समुचित चिकित्सकीय सलाह से औषधि सेवन के त्रिशूल से उत्तम नियंत्रण सुनिश्चित किया जा सकता है। संतुलित भोजन से पर्याप्त प्रोटीन वसा उपलब्ध हो जाए परंतु शर्करा या कार्बोहाइड्रेट जो चावल, आलू, प्याज, मिठाई, बिस्कुट, गेहूं आदि में उपस्थित रहती हैं वो न लिए जाएं. न्यून मात्रा में प्राप्त ऐसे द्रव पदार्थ जो शक्कर डालकर मीठे बनाए जाते हैं, सर्वाधिक घातक से होते हैं, जिसमें मीठी चाय, मीठा दूध, व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में फलों का रस, पैक्ड जूस या दूध, एनर्जी ड्रिंक तथा शराब भी सम्मिलित है। ये द्रव शरीर के रक्त में बहने वाली शक्कर के सामान्य स्तर से ऊपर बनाए रखते हैं तो अग्नाशय को इंसुलिन का निर्माण करने के लिए उत्तेजित करता है और ये अनुशासित ग्रंथि एक लंबे समय की उत्तेजना के बाद स्थगित कर मधुमेह रोग का कारण बन जाती है. भोजन के साथ आलस भरा जीवन हो तो भी मनुष्य को मधुमेह रोग की संभावना बन जाती है। यदि पैदल चलना न हो, व्यवसायिक गद्दी या ऑफिस में निरंतर लंबी बैठकें तो रक्त में प्रवाहित शक्कर को कोशिकाओं की मेटाबॉलिज्म में आवश्यक नहीं होती है।
जरुरत यह है कि शरीर का निरंतर चलते रहना. कार्बोहाइड्रेट एक भोजन का अभिन्न तत्व है ओर इसे जलाना जरुरी है इसलिए आज के परिदृश्य में प्रतिदिन 10,000 कदम पैदल चलने की सलाह दी जाती है. जबकि आप याद करेंगे हमारे पूर्वज निरंतर पैदल चलते थे और सदा सवस्थ रहते थे. नियमित पैदल चलना, कम दूरी की दौड़ या तैरना या इंडोर-आउटडोर के खेल गतिविधि के द्वारा मधुमेह जैसे डरावने रोग को परे रखा जा सकता है और मधुमेह रोगी होने की स्थिति में नागरिक बेहतर रूप से रक्त में शक्कर के स्तर को नियंत्रित भी रख सकते हैं।
त्रिकोण का अंतिम बिंदु है मधुमेह नियंत्रक औषधि का दैनिक सेवन या इन्सुलिन का इंजेक्शन.
मधुमेह के रोगी अपने चिकित्सक की सलाह से नियमित शक्कर नियंत्रक गोली या सीधे इन्सुलिन का इंजेक्शन लेना लंबी आयु प्रदान करने में सहायक होता है। इन्सुलिन के इंजेक्शन अब दर्द रहित हैं ओर उनका उपयोग भी आसान है. अब आधुनिक चिकित्सा की रिसर्च द्वारा शक्कर के आंतों से नियंत्रित अवशोषण या मुक्त मार्ग से अधिक शर्करा की बाहर निकासी की औषधियाँ उपलब्ध है जो चिकित्सकीय सलाह से आपके मधुमेह के नियंत्रण अति प्रभावी है।


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