भारत के व्यावसायिक परिदृश्य में अद्भुत बाजार है, सब्जी मंडी का बाजार.
इस बाजार में अनुभवहीन और अनुभव से भरे ग्राहक और विक्रेताओं के मानस का वह परीक्षण होता है जो किसी भी वाक्-पटू दंगल से काम नहीं होता है. कभी आप किसी हाट बाजार में लगने वाले इस सब्जी (वाक पटु- दंगल) स्थल में बेचने वाले (विक्रेता) और खरीदी करने वाले (क्रेता) के मध्य स्थापित होने वाले संवाद का अवलोकन करें, श्रवण करने का प्रयास करें तो निसंदेह आपको व्यवसाय की एक नई परिभाषा
समझ आएगी जिसमें क्रेता सदैव विक्रेता को कम भाव करवाकर सौदा निश्चित करने का प्रयास करते हैं. वही विक्रेता भी अपने ग्राहक को कुछ इस प्रकार सांचे में ढालते हैं कि उनका
क्रय मूल्य, भार – वहन का व्यय और बेचवाल का 10 से 30 प्रतिशत का लाभ भी हो जाये
सब्जी मंडी में भांति – भांति की भाव सूची होती है जो भाव पूछे जाने पर बतलाई तो जाती ही है, मूल भाव की अतिरिक्त गुंजाइश भी बोली जाती है
उदाहरण के लिए यह पूछा जाने पर कि
क्या भाव है आलू? के कितने संभावित उत्तर हो सकते हैं—-
- ₹25 किलो
- ₹25 का 1 किलो 40 का 2 किलो
- एक भाव 20 रुपए का 5 किलो
- कितना लोगे, मात्रा में अधिक हो तो मोल भाव की अतिरिक्त गुंजाइश बताई जाती है
- ये वाला ₹25 किलो और यह ₹35 किलो *जहां एक छोटा व मध्यम आकार का आलू तथा दूसरा बड़े आकार के आलू का भाव बताया जाता है )
- ₹15 में कैसे दे दें , बीस में तो घर में पड़ा है (यह पूछे जाने पर की ₹15 किलो में दे दो)
- आलू महंगा हो गया भाभी जी अभी 25 बेचा है अब आपके लिए 20 का लगा देंगे
आलू की आवक कम है , दीदी घर जाने का भाव आपके लिए 20 लगा देंगे
छांट के लोग तो ₹30 बिना छांटे लगे तो ₹25 किलो
इससे अच्छा आलू हाट में मिले तो मुफ्त में दे दूंगा दीदी
आमतौर पर सब्जी मंडी की साप्ताहिक हाट में दाल मसाले, फल और आलू प्याज जैसे सब्जी हार्डवेयर का व्यवसाय पुरुष समाज के विक्रेता करते हैं जबकि जल्द खराब होने वाली सॉफ्टवेयर सब्जियों का व्यापार महिलाओं के जिम्मे में होता है. यह कदाचित पुरुषों की कुछ हद तक बेहतर भार ढोने होने की क्षमता के कारण हो परंतु सब्जी विक्रय में गांव की महिलाएं भी अपने सब्जी के उत्पादन का मोल भाव, तौलना, हिसाब किताब तथा मुद्रा राशि के रक्षण का कार्य भली भांति कर ही लेती है.
मेथी, धनिया, पालक, गिलकी, भिंडी, गोभी फूल, पत्ता गोभी, मूली, मटर, गाजर, परवल, कुंदरु, टमाटर और अन्य पत्तेदार फलो आदि सब्जी का व्यापार महिलाएं बखूबी और कुशलता से कर लेती हैं
दो महिला क्रेता और विक्रेता के मध्य सब्जी के सौदे हेतु संवाद का आनंद लीजिए
क्रेता – मूली का क्या भाव है?
विक्रेता – ₹10 की एक.
क्रेता- ठीक से लगाओ!
विक्रेता – भाव तो यही है.
क्रेता- अरे बोल रहे हैं ठीक से लगाओ!
विक्रेता – ले लो
क्रेता – क्या भाव ?
विक्रेता – ले लो, आपको 20 की तीन लगा देंगे
क्रेता- नहीं ,
विक्रेता -अरे दीदी घर में भी नहीं पड़ता है
क्रेता- अरे 20 की 4 दे दो
विक्रेता- नहीं दीदी रहने दो
क्रेता- अरे हमको ज्यादा लेनी है
विक्रेता – कितनी
क्रेता- 4
विक्रेता -अरे दीदी 4 के आप ₹25 दे देना
महिला क्रेता ने छांट छांट कर 4 मूली निकाल लिया और 20 का नोट थमा दिया
विक्रेता – अरे दीदी 5 का एक और नोट दे दो
क्रेता- अरे नहीं सब जगह यही भाव है
विक्रेता – दीदी, यह मूली अच्छी है तभी तो आप यहां रुके ₹5 और दो
क्रेता- नहीं नहीं जो देना था दे दिया
विक्रेता – नहीं नहीं, दीदी नहीं पड़ता है आप मूली वापस रख दो
क्रेता- अरे तुम तो मान ही नहीं रही यह लो ₹5 और चार मूली और दे दो.
यह मोल भाव, चंद मुद्रा राशि बचाने को है या मात्र मोल भाव की रस्म अदायगी या एक विभिन्न प्रकार का मनोरंजन या अपनी बात मनवाने का प्रयास कहना जटिल है परंतु एक बात तो तय है कि आत्म्शलाघा का एक प्रयास अवश्य है ताकि बाद में कहा जा सके कि देखा बहस कर कर सस्ता करवा लिया.
धनिया मेथी पालक की गड्डी आमतौर पर एक निश्चित भार की होकर एक निश्चित भाव पर बेची जाती है और मूली के नग की भांति ही यही मोलभाव की बहस हर काउंटर पर नए सिरे से आरंभ हो समाप्त होती है
महिला विक्रेता आमतौर पर कड़क मोल भाव कर लेती हैं जबकि पुरुष मनभावन मोल ना मिले तो शीघ्र हथियार डाल, सौदे की ना कर देते हैं इसके बाद क्रेता, विक्रेता पुरुष के तय किए गए मूल भाव पर ही सौदा तय हो जाता है.
दुखद लगे कदाचित आपको कि मुद्राराक्षस (धन) के सभी वाहक अपनी मोल भाव करने की क्षमताओं का प्रदर्शन सब्जी मंडी की साप्ताहिक हाट में ही करते हैं जहां विक्रेता भी अपने धैर्य के तोल कांटे में क्रेता
के चातुर्य को आजमाते हैं. छोटे व्यापारी से मोल भाव की यह आदत किसी शॉपिंग माल के जगमग और लकदक शोरूम में क्रेता के लिए बार्गैनींग के मौके जैसे गधे के सर से सींग की भांति गायब हो जाते हैं और बड़ा और धनी और वाकपटु क्रेता भी अपने कार्ड से पैसा देते चलता है.
वह भूल जाता है कि यह आम व्यक्ति
कि छोटा व्यापारी वह आम व्यक्ति है जिसके दिन भर की मेहनत की कमाई की मुद्रा बच्चों की पढ़ाई , दैनिक जीवन यापन, घर के अनाज व कपड़ों इत्यादि में काम आएगी जबकि उन्नत उच्च स्तर के शोरूम में प्राप्त लाभ राशि से नए अतिरिक्त भवन या चांदी के बर्तनों के डिनर का सेट ही शोरूम के मालिक द्वारा क्रय किया जाएगा
विचार कीजिएगा

absolutely correct…we should not bargain with these poor people.I never do always give a bit more
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