दोंची बचाई के….
इटावा, बुंदेलखंड और ब्रज खण्ड का जोड़ क्षेत्र है जहां बृज और बुंदेली बोली का प्रभाव देखा जाता है. बोली को परिभाषित करें तो भाषा विशेष की शुद्धता के पांडित्य से विचलन है जो आमजन के संवाद की बोलचाल की भाषा बन जाता है. भाषा का वह स्वरूप जो एक छोटे क्षेत्र में बोलने के लिए उपयोग में लाया जाता है उसे बोली कहा जाता है. यह आमतौर पर 18 प्रकार की होती हैं. हिंदी की अनेक बोलियां या उप-भाषाएं हैं जिनमें अवधी, ब्रज भाषा, कन्नौजी, बुंदेली, बघेली, हाडोती, भोजपुरी, हरियाणवी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, नागपुरी, मैथिली, खोरठा, पंचपड़गानिया, कुमाऊनी, मगही आदि प्रमुख हैं.
उदाहरण के लिए,
काय लला कित को जाए रहे…
अर्थात
क्यों बेटा कहां जा रहे हो. और इस प्रकार भाषा की उपभाषा, बोली के रूप में प्रकाशित हो जाती है.
बोली का महात्म्य भजन- कीर्तन, पंच-पंचायत की बैठकों और विवाह समारोह आदि में न केवल प्रदर्शित होता है बल्कि एक संतति क्रम से परिवार और समाज के बुजुर्गआ वर्ग से बच्चा वर्ग में अनजाने ही स्थानांतरित हो जाता है जिसे आज की समझ में डाउनलोड हो जाने की घटना के समानांतर रखा जा सकता है. गुलाम भारत में रेल की उपस्थिति एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती रही है. यहां भारत आध्यात्मिक के स्तर पर तो उचित स्थान पर स्थापित था परंतु विज्ञान की समझ होने पर भी मशीनों के आविष्कारों में हम अछूते ही रहे, पिछड़े रहे. और ग्रामीण क्षेत्रों में तो सब से ही अछूतपन रहा मशीनी युग का. ऐसा ही दृश्य उपस्थित हुआ जब इटावा के नवनिर्मित स्टेशन पर भारत की आजादी के पूर्व पहली बार रेल का आगमन हुआ. चम्बल क्षेत्र के भिंड, मुरैना, इटावा, जालौन के ग्रामीण आमजन पैदल बैलगाड़ी घोड़े पर सवार हो इस दुर्लभ और अनसोचीऔर कभी न देखी घटना के साक्षी होने को एकत्र होते चले गए. उत्साह इतना कि धोती-कुर्ता पहने दरिद्र, बंडी -टोपी पहने छतरी लगाए प्रबुद्ध इटाये याने इटावा के रेल के विश्राम स्थल यानी प्लेटफार्म पर एकत्र हो गए.
इतओर तितओर चहुंओर नरमुंड ही नरमुंड, सफेद स्वच्छ औ पीले गंदे कपरा डारे गाँव की लम्बी छोटी मझोल उर्जायेँ.
कन्धा पे बिठारे छोट छोट बच्चा और अंगुरी थामे बच्चा बच्चियाँ.
प्लेटफॉर्म रुपी चबूतरे पर भीड़ ही भीड़ और पुलिस व्यवस्था जैसे तैसे बनी रह पा रही थी.
अखियां दूर से रेल पटरी को तक रही कि इस पर कहां हो ये गाड़ी चलेगी, कि मोटर चलेगी,कि रेल गाड़ी चलेगी या इंजन चलेगा.
कछु समझ नहीं आ रओ हतो
और दूर पटरी की रास्ता तकते ग्रामीण परिदृश्य के यह नागरिक एक कभी न सोचे घटनाक्रम देखने को बार-बार तक रहे कि
जा लंग ते मोटर आएगी.
(इधर से मोटर आयेगी)
और तभी किसी को रेलगाड़ी की सीटी की आवाज सुनाई पड़ी तो चिल्ला पड़ा ,
बा सुनाई दे गई सीटी, अब आवे वारि है रेलगाड़ी.
सभी लोग एक दूसरे के ऊपर झूम उठे. 2-4 तो पटरी पर गिर भी गए तुरंत लौटकर पटरी से लौट प्लेटफार्म रूपी चबूतरे पर फिर आ गए और रेल की सीटी की आवाज पास आती रही.
अब तो रेल के भाप के इंजन की आवाज भी सुनाई देने लगी और जैसे ही पटरी के घुमावदार मोड़ पर स्टेशन में खड़े नागरिकों को रेल के इंजन के धुयें की भक भक होती लकीर दिखाई पड़ी,बच्चे – बूढ़े, स्त्री-पुरुष आंखों को चौड़ा कर इस अमूल्य दृश्य को देखने के लिए अपने पंजों पर खड़े होने लगे. जिस मंथर गति से रेल आती प्रतीत हो रही थी, जनता को लगा बड़ी धीरे है परंतु तेज गति से रेलगाड़ी का इंजन अपने पीछे समेटे हुए बच्चे की भान्ति सवारी डब्बे लिये तेजी से प्लेटफार्म पर आने लगी.
तभी हमारे गाँव के किसान चाचा विदूषक चिल्ला पड़े
ज़े आय गई मोटर रेल काला धुआँ देती भाई भैया,
चौतरा बचाए के चौतरा बचाए के,
गाड़ी से चौतरा पर टक्कर न दे दिया लला,
चौतरा पर से पीछे हट जाओ,
जे सीधे चौतरा पर देगी टक्कर देगी,
चौतरा बचाए के.
उधर से ट्रेन आती जा रही इधर से यह किसान महाराज अपनी रनिंग कमेंट्री देते रहे जैसे ड्राइवर सुन भी रहा हो,
भैया रेल वारे भैया
दोंची बचाए के
संभार के लाइयो
जे मजबूत चौंतरा बनाओ है
ज़े रेल को दोंची लगा देहे,
चोट ना लगने पाए
और ट्रेन धीरे धीरे धीरे धीरे प्लेटफार्म पर प्रवेश कर गई
अब किसान चाचा की मानसिक स्थिति देखने लायक थी क्योंकि प्लेटफार्म पर उपस्थित जनसमूह उन्हें देखकर हंसी के मारे ठहाके लगा रहा था कि किसान चाचा चबूतरा बचाने की बात इतनी गंभीरता से कह रहे थे जैसे रेल चलाने वाले भैया सुनी लेंगे और प्लेटफार्म नामक चौंतरा याने चबूतरा बचा ही लेंगे लेकिन किसान चाचा भी समझदार थे
बोल लिए कि
हमने कही, तभी तो उन्हें दोंची बचाई
हमाये क़हवे से ही रेल चौंतरा बच गओ और रेल भी बच गयी
😀

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