Man vs Mind

वायुपुराण में लिखा है-

मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना कुंडे कुंडे नवं पय:,
जातौ जातौ नवाचारा: नवा वाणी मुखे मुखे.

जितने मनुष्य हैं उतने विचार हैं, एक ही स्थान के अलग अलग कुंओं के पानी का स्वाद अलग अलग होता है. एक ही संस्कार के लिए अलग अलग जातियों में अलग अलग रिवाज होता है तथा एक ही घटना का वर्णन हर व्यक्ति अपने ढंग से अलग अलग करता है….अर्थात् भिन्नता भी प्रकृति का नियम है…

मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना… अर्थात जितने नरमुंड हैं उसमें जो बुद्धि का समावेश है, प्रत्येक व्यक्ति में भिन्न स्तर पर है और उसके साथ में यह भी कहा जाता है कि…. यथा ब्रह्मांडे तथा पिंडे, अर्थात हर व्यक्ति में ब्रह्मांड स्वरूप लीलाएं समाहित है. इतना सब होने के बावजूद बाद भी हमारे जीवन में कहीं ना कहीं संतुष्टि और खुशी का भाव है कारण कुछ भी हो विचार अनिवार्य है…

यथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे

‘यथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे’ -चरक संहिता का यह श्लोकांश हमें समझाता है कि जो कुछ भी इस ब्रह्माण्ड में है वही सब हमारे शरीर में भी है।
यह भौतिक संसार पंचमहाभूतों से बना है- आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। उसी प्रकार हमारा हमारा यह शरीर भी इन्हीं पाँचों महाभूतों से बना हुआ है। जब जीव की मृत्यु होती है तो उसके उपरान्त ये पाँचों महातत्त्व अपने-अपने तत्त्व में जाकर मिल जाते हैं।

इतना सब कुछ समान होने के बाद भी मानस समान नहीं होते है…

….एक कथा कहता हूं जिसमें एक परिवार के मुखिया अपनी जवानी के दिनों से ही मद्यपान किया करते थे और अच्छी खेती की जमीन होने के बावजूद शराब की लत से पीड़ित हो और असमय ही दो बालकों को बिलखता छोड़कर काल के ग्रास हो जाते हैं… समय बीतता है… कष्टों में बच्चों का जीवन बीता है और बच्चे भी बड़े हो जाते हैं.

गांव के लोगों ने वह शराबी पिता का उदाहरण लेते दोनों बच्चों को कुछ इस भांति देखा कि बड़ा बच्चा शराब की लत का आदी था जबकि छोटा बच्चा शराब से कोसों दूर हो सफल व्यवसाई बन गया ….जब बड़े बेटे से पूछा जाता कि तुम शराबी कैसे बने तो बड़ा बेटा बोलता …..मेरे पिताजी शराबी थे …मैं और क्या शिक्षा ले सकता हूं उनसे …

और यही प्रश्न जब छोटे बेटे से पूछा जाता तो वह कहता…. मेरे पिता शराबी थे और क्या शिक्षा ले सकता हूं मैं….

किसी भी स्वरूप में साधक या नागरिक के लिए बहुत आसान है कि वह उपदेश देकर समाज में चिंतन की और परिवर्तन की एक नई मिसाल कायम कर दें लेकिन जब यही चिंतन स्वयं के ऊपर लागू करने के लिए उपस्थित हो तो संभवतः मानव मन विपरीत ध्रुव की तरफ खिसक जाता है ….उम्र बढ़ने के साथ परिवार में जो खटपट होती है वह पूरी उम्र संजोए गए अनुभव या किताब में पढ़े गए ज्ञान और समाज के बुजुर्गों वृद्धों तथा वाच्य को के उपदेशों को सिरे से खारिज कर क्रोध की दावाग्नि में भस्म करने को तैयार हो जाती है,

अखिल उपदेश जुबान पर ही क्यों सिमट कर रह जाते हैं …और वह हमारे जीवन में उतर क्यों नहीं पाते …हम उनका पालन क्यों नहीं कर पाते ….चाहे वह झूठ ना बोलने वाली छोटी बात क्यों ही क्यों ना हो.

…हम कहां गलत हो जाते हैं ?

क्यों… सही कहा न…

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