अनादि काल से नदियों के समीप सभ्यताएं विकसित और पल्लवित होती रही और नष्ट भी होती रही है. नदियों के किनारे पनपी सभ्यताएं अपनी बोली और भाषा के माध्यम से रस बहाती रही हैं… कहने को तो चंबल नदी, महू इंदौर के पास जानापाव की पहाड़ियों से 7 नदियों के साथ उद्गम होती हैं परंतु इनका विहंगम रूप मध्यप्रदेश के उत्तरी क्षेत्र भिंड मुरैना इटावा में प्रभावी रूप से प्रदर्शित होता है जो गरम मानस और प्राकृतिक न्याय की पालन मानसिकता के अनमोल धरोहर है जहां आज भी मजबूत कद काठी के नवजवान सेना और पुलिस सेवा को प्रथम वरीयता देते हैं और एक जमाने तक यह गरम खून , अन्याय होने पर हथियार उठा बीहड़ में कूद जाते थे.
… और यही भिंड जिले के चंबल की बीहड़ों में अटेर तहसील पीली मिट्टी में सरसों के खेतों में सभ्यता का जुनून प्रदर्शित होता है.
इस क्षेत्र की संस्कृति और बोली की एक प्रस्तुति-
यदि आपने :
क्या आपने कभी भाड़ में अनाज को भुन्जते देखा है।
घर के दालान को समझा है।
क्या आप ओसारा जानते हैं।
सायबान के नीचे बैठे हैं?

दुवारे पर कचहरी (पंचायत) देखी है।
राम राम के बेरा दूसरे के दुवारे पहुंच के चाय पानी किये हैं।
दतुअन किये हैं।
पोहे को सानी किये हैं!
सानी के भुस और बांट के मट्के का भोजन मिलाते देखे हैं.
ओ हैया हो, ब्यारु कर जाओ, की पुकार भोरहीं की बेरा सुने हो.
दिन में दाल-भात-तरकारी
खाये हैं.
मठे के आलू की सब्जी खाये हैं.
हाथ की चकिया में अनाज डाल हाथो से चकिया चलाये हो.
रात में दिया और लालटेन जलाये हैं।
मसान बाबा के पूजन किये हो.
कोसड़ देवी की पूजा जेठ मास में किये हैं.
तलवा में तैरे हो.
महादेव तला के पीपुरा की छान्ह में लेटे हैं.
कबहूं लोटा ले के दिशा शौच को गये हैं?
काये लला, कौन के मोड़ा हो, पूछे गये हो.
कूहर न करो लला, की समझाईश दिये गये हो.
दिवाली पर गुड के गट्टा, बताशे खा, गाँव के पुरखा लोगन के पायँ लागी कह आशीर्वाद लिये हो.
तलाव (ताल) के किनारे बरगद के भूत का किस्सा (कहानी) सुने हैं.
ससुरार सुख की सार, जो रहे दिना दो चार,
जो रहे इक पखवाडा, उठा हाथे कुदाली औ फाड़ा
जैसी कहावत सुने हैं.
फाड़ा जानते हैं.
नाल कभी उठाये हैं.
कुदार देखे हैं.
कुआं से घिर्रि में रस्सी डाल बाल्टी से पानी खींचे हैं.
रसरी आवत जावत सिल पर पडत निसान, के कहावत के कुआं की पद्दीया पर रस्सी के निशान देखे हैं.
दुपहरिया मे घूम-घूम कर आम, जामुन, बेल के फल तोड़ कर सीधे बिना धुले खाये हैं.
खेस जानते हैं और अनाज भर के खेस पर गठान लगा मूड़े पर लदान किये हैं?
चिलचिलाती धूप के साथ लू के थपेड़ों में बगिया में कबड्डी, चिरैया या ता-ता का खेल खेले हैं.
पोखरा-गड़ही किनारे बैठकर बिना बात पंचायत किये हैं.
पोखरा-गड़खा किनारे खेत में बैठकर 5-10 यारों की टोली के साथ तीतर पकड़ने में शामिल हुए हैं.
ठंड में अलाव लगा सेंक किये हैं?
अलाव के चारों ओर बैठ दद्दा से दुनिया के किस्से सुने हैं?
टेना का अर्थ जानते हैं.
कौड़ी देखे हैं?
गांव आई बारात की खातिरी में भोजन के लिये गरमागरम उबले हुए आलू छीले हो.
बारात परदेश गई हो तो खुइया सुने हो या चोरी छिपे देखे हो.
अलाव पर बैठ धीमी आंच पर आलू, चने के होरा, अरहर, मटर, ज्वर, बाजरे की बाल, शकर कन्द को सेंक कर खाने मजा लिये हैं.
जेठ के महीने की बड़-सावित्री अमावस पूजा देखे हैं और पूजा के गुठेठे खाये हैं.
बैलगाड़ी की सवारी किये हो.
खेत जोतने के समय पटेला पर बैठे हो.
लभेड़े और टेंटी का अचार खाये हैं?
अगर आपने सत्तू घोल के पिया है.
बचपन में चौपर खेला है.
गाय को पगुराते हुए देखा है।
बचपने में पंच -गट्टे खेला है।
दुधारू और किसानी पशुओं को सानी खिलाते किसी को देखा है।
घर के आंगन को गोबर से लीपते हुए देखा है.
घर के आंगन में सावन के महीने में झूले डाल कर झूले हैं.
पीली मिट्टी से चूल्हा पोतते हुए देखा है.
सिगड़ी/ कंडा तापा है.
बिच्छू का मन्त्र से जहर उतारते देखा है.
दीवाली के बाद गोवर्धन पूजा में घरेलू दुधारू पशु की सजावट और मान सम्मान देखा है।
अगर देखे है या किये है तो समझिये कि आपने एक अद्भुत ज़िंदगी जी है, और इस युग में ये अलौकिक ज़िंदगी ना अब आपको मिलेगी ना आने वाली पीढ़ी को,
क्योंकि आज उपरोक्त चीजें विलुप्त प्राय होती जा रही हैं या हो चुकी हैं।
(मेरे पितामह, साधू बाबा की स्मृति में मेरे गाँव क्यारीपुरा को सादर समर्पित)
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