इंदौर के समाचारपत्र दैनिक भास्कर में 26 अक्टूबर 2003 को प्रकाशित श्रीराम काल्पनिक अथवा वास्तविक के नाम से श्रीमती सरोज बाला (जो उस समय दिल्ली में आयकर आयुक्त थी) के द्वारा लिखा गया है जो यहां प्रस्तुत है –
हम भारतीय विश्व की प्राचीनतम सभ्यता के वारिस हैं और हमें अपने गौरवशाली इतिहास एवं उत्कृष्ट प्राचीन संस्कृति पर गर्व होना चाहिए किंतु दीर्घकाल की परतंत्रता ने हमारे गौरव को इतना गहरा आघात पहुंचाया है कि हम अपनी प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति के बारे में खोज करना और उसको समझने की इच्छा ही छोड़ बैठे. स्वतंत्र भारत में पढ़े-लिखे युवक-युवतियां सत्य की खोज करने में समर्थ है तथा छानबीन के आधार पर निर्धारित तिथियों तथा व जीवन मूल्यों को विश्व के आगे गर्वपूर्वक रखने का साहस रखते हैं. वास्तव में श्रीराम द्वारा स्थापित आदर्श हमारी प्राचीन परंपराओं तथा जीवन मूल्यों के अभिन्न अंग है और श्री राम भारतीयों के रोम रोम में बसे हैं.
परंतु प्रश्न पैदा होता है कि श्रीराम कौन थे, कहां पैदा हुए, क्या उन्होंने आज अयोध्या से रामेश्वरम तक वनों जंगलों और पर्वतों की वास्तविक में यात्रा की थी?
आइए इन प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयत्न करें,
श्रीराम जी की जीवन गाथा प्रथम बार महर्षि वाल्मीकि ने लिखी थी.
वाल्मीकि रामायण – श्री राम के अयोध्या में सिंहासनरुढ होने के बाद लिखी गई. महर्षि वाल्मीकि एक महान खगोल विद थे और उन्होंने राम के जीवन में घटित घटनाओं से संबंधित तत्कालीन ग्रह नक्षत्र और राशियों की स्थिति का वर्णन किया है. यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि ग्रह नक्षत्रों तथा राज्यों की उसी स्थिति की पुनरावृत्ति हजारों साल में भी नहीं होती है. भारतीय राजस्व सेवा में कार्यरत पुष्कर भटनागर ने अमेरिका से प्लैनेटेरियम नामक सॉफ्टवेयर प्राप्त किया जिससे सूर्य चंद्रमा के ग्रहण की तिथियां तथा अन्य ग्रहों की स्थिति तथा पृथ्वी से उनकी दूरी वैज्ञानिक तथा खगोलीय पद्धति से जानी जा सकती है. इसके द्वारा उन्होंने महर्षि वाल्मीकि द्वारा वर्णित खगोलीय स्थितियों के आधार पर आधुनिक अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख निकाली है. इस प्रकार उन्होंने श्री राम के जन्म से लेकर 14 वर्ष के वनवास के बाद वापस अयोध्या पहुंचने तक की घटनाओं की तिथियों का पता लगाया है जो बहुत ही सटीक, रोचक तथा अविश्वसनीय भी है. श्रीराम के जन्म की तिथि महर्षि वाल्मीकि ने बालकांड के सर्ग अट्ठारह के श्लोक नंबर 8 और 9 (1/18/89) में वर्णन किया है कि श्री राम का जन्म चैत्र माह की नवमी तिथि को हुआ उस समय ग्रहों नक्षत्रों तथा राशियों की स्थिति इस प्रकार थी –
सूर्य मेष में
शनि तुला में
बृहस्पति कर्क में
शुल्क मीन में
मंगल मकर में
चैत्र शुक्ल पक्ष
चंद्रमा पुनर्वसु के निकट कर्क राशि
नवमी की दोपहर समय लगभग 12:00 बजे
उपर्युक्त खगोलीय स्थिति को कंप्यूटर में प्रविष्टि कराई जाती है तो प्लेनेटोरियम सॉफ्टवेयर के माध्यम से यह निर्धारित हुआ कि 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व दोपहर के समय ग्रहों नक्षत्रों तथा राशियों की स्थिति बिल्कुल यही थी जो महर्षि वाल्मीकि ने वर्णित की है इस प्रकार श्री राम का जन्म 10 जनवरी संत 5114 ईसा पूर्व याने लगभग 7117( आज से 7137) वर्ष पूर्व हुआ जो भारतीय कैलेंडर के अनुसार चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि है और समय 12:00 से 1:00 के बीच का है. सारे भारत में आज इसी समय राम जन्म महोत्सव मनाया जाता है.
श्री राम अयोध्या में पैदा हुए इस तथ्य की पुष्टि ईशा के जन्म से पूर्व तथा बाद में लिखे गए भारतीय एवं विदेशी साहित्यकारों द्वारा रचित साहित्य से होती है जैसे बाल्मीकि रामायण, तुलसीदास द्वारा रचित श्री रामचरितमानस, कालिदास द्वारा रचित रघुवंशम तथा बौद्ध और जैन साहित्य की पुस्तकों में अयोध्या की स्थिति औत समृद्ध आर्किटेक्चर के वर्णन के साथ साथ विशाल क्षेत्र में फैले हुए सुंदर भवनों तथा भव्य मंदिरों का वर्णन भी है. अयोध्या नगरी सरयू के किनारे बसी थी जिसके एक और गंगा और पांचाल प्रदेश तथा दूसरी और मिथिला राज्य थे. 7000 वर्ष का समय बहुत लंबी अवधि है और इस अवधि में भूकंप, बाढ़,चक्रवात और विदेशी हस्तक्षेप ने नदियों का नाम- मार्ग बदल दिया. नगर भवन ध्वस्त कर दिए गए और क्षेत्रीय दशा बदल दी इसलिए अवशेषों के आधार पर सत्य की खोज करना अत्यंत कठिन कार्य है परंतु वर्तमान में अयोध्या सिकुड़ कर छोटी हो गई है और नदियां 40 किलोमीटर उत्तर दक्षिण में मार्ग बदल चुकी है. जैसा की सर्वविदित है अपने बचपन में ही (वाल्मीकि रामायण के अनुसार 13 वर्ष की उम्र में) श्री राम महर्षि विश्वामित्र के साथ अयोध्या से बाहर तपोवन गए थे जहां महर्षि विश्वामित्र रहते थे. वहां से वे राजा जनक की राजधानी मिथिला गए थे और उन्होंने शिव धनुष तोड़ सीता जी से विवाह किया था. वाल्मीकि रामायण के वर्णन के अनुसार श्रीराम ने अयोध्या से जो मार्ग लिया था शोधार्थियों ने उस मार्ग की खोज की है और श्री राम के जीवन से संबंधित 29 स्थानों की खोज किए जहां आज भी श्रीराम के स्मृति चिन्ह बने हुए हैं उनमें रामघाट, ताड़का वन, श्रंगी आश्रम, गौतम आश्रम, जनकपुर (नेपाल) तथा सीताकुंड आदि है.
श्री राम के वनवास की तिथि-
वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड के अनुसार (2/4/18) राजा दशरथ श्रीराम का राज्याभिषेक करना चाहते थे क्योंकि उस समय उनका नक्षत्र सूर्य मंगल और राहु से घिरा हुआ था. ऐसी खगोलीय स्थिति में या तो राजा मारा जाता है वह किसी षड्यंत्र का शिकार हो जाता. राजा दशरथ मीन राशि के थे और उनका नक्षत्र रेवती था. यह सभी तथ्य कंप्यूटर में डाले गये तो पाया कि 5 जनवरी वर्ष 5089 ईशा पूर्व के दिन सूर्य मंगल और राहु तीनों मीन राशि के रेवती नक्षत्र पर स्थित थे. यह सर्वविदित है कि राजतिलक वाले दिन ही राजा को राजा राम को वनवास जाना पड़ा था. उस समय श्रीराम की आयु 25 (वर्ष 5114 – 5089)
की निकलती है तथा वाल्मीकि रामायण में इंगित हैं कि जब श्रीराम में 14 वर्ष के लिए अयोध्या से वनवास को प्रस्थान किया तब वे 25 वर्ष के थे वाल्मीकि रामायण के अनुसार वनवास के 14 वर्ष के मध्य ही श्रीराम का खर – दूषण से युद्ध हुआ तथा उस समय सूर्य ग्रहण हुआ था और मंगल ग्रहों के मध्य में था. जब इस तारीख के बारे में कंप्यूटर सॉफ्टवेयर में जांच की गई तो पता चला कि यह तिथि 7 अक्टूबर 5077 ईसा पूर्व (अमावस्या) थी इस दिन सूर्य ग्रहण हुआ जो पंचवटी से देखा जा सकता था उस दिन ग्रहों की स्थिति वैसी थी जैसी वाल्मीकि जी ने वर्णित की थी. मंगल बीच में था, एक दिशा में शुक्र और बुध तथा दूसरी दिशा में सूर्य और शनि थे. इसी प्रकार अन्य अध्ययनों में वाल्मीकि द्वारा वर्णित ग्रहों की स्थिति के अनुसार अन्य घटनाओं की तिथियां भी सॉफ्टवेयर द्वारा निकाली गई जैसे श्री राम ने अपने 14 वर्ष के वनवास की यात्रा 2 जनवरी 5075 ईसा पूर्व को पूर्ण की और यह दिन चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की नवमी ही था. इस प्रकार श्री राम अयोध्या लौटे तो वे 39 वर्ष के थे( 5114 – 5075).
एक और शोधार्थी डा. राम अवतार, श्री राम की 14 वर्ष की वनवास यात्रा की खोज में लगे हैं उन्होंने वाल्मीकि रामायण का अध्ययन किया और घटनाओं की जांच करते हुए संबंधित स्थानों की यात्रा की. अयोध्या से यात्रा आरंभ करके रामेश्वरम तक गए उन्होंने सीताराम जी के जीवन से संबंधित रामायण में वर्णित 195 स्थानों की खोज की है जहां अभी तक स्मृति चिन्ह पाए जाते हैं इनमें तमसा तट, श्र्ग्वेर्पुर, भारद्वाज आश्रम, अत्रि आश्रम, मार्कंडेय आश्रम चित्रकूट, सीता सरोवर, राम कुण्ड, त्रयम्बकेश्वर, शबरी आश्रम, किष्किन्धा, धनुष्कोटी तथा रामेश्वरम मंदिर सम्मिलित हैं.
वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्री राम की सेना ने रामेश्वरम से श्रीलंका तथा समुद्र के ऊपर पुल बनाया. इसी पुल को पार कर श्री राम ने राक्षस राजा रावण को हरा दिया. हाल ही में नासा ने इंटरनेट पर भारत मानव निर्मित पुल के वह अवशेष दिखाएं जो पाक स्ट्रेट में समुद्र के नीचे रामेश्वरम से लंका तक 30 किलोमीटर लंबे रास्ते में पड़े हैं. पिछले दिनों श्रीलंका सरकार ने सीता वाटिका को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की इच्छा व्यक्त की है. लंका वासियों का विश्वास है कि यह जगह उसी अशोक वाटिका की है जहां रावण ने सीता को कैदी बनाकर रखा था. यह घटना 5076 ईसा पूर्व की प्रतीत होती है. राम राज्य में जाति व्यवस्था की बुराइयां नहीं थी महर्षि वाल्मीकि कथित रूप से शुद्र थे किंतु श्रीराम द्वारा निर्वाचित सीता जी उनकी गोद ली हुई पुत्री की तरह उनके आश्रम में रहे श्रीराम के सुपुत्र लव कुश भी वाल्मीकि की जी के शिष्य थे. हमें इस बात पर गर्व होना चाहिए कि महर्षि वाल्मीकि प्रथम महान खगोलविद थे. ग्रह नक्षत्रों की स्थिति का उनका ज्ञान समय के अनुसार सत्यता और कंप्यूटर तथा सॉफ्टवेयर के आविष्कारों ने यह सिद्ध कर दिया है कि ग्रहों की स्थिति के यहां क्रम में उन्होंने नाम मात्र की भी त्रुटी नहीं की. शबरी बनवासी भील जाति की थी तथा राम जी की सेना जिस ने रावण को परास्त किया उसमें मध्य और दक्षिण भारत के वनवासी जातियों- जनजातियों के योद्धा शामिल थे. इस प्रकार राम जी के जीवन से संबंधित सभी तथ्य और घटनाएं हम सभी भारतीयों चाहे वह किसी जाति पंथ क्यों सामूहिक धरोहर हैं.
आलेख दैनिक भास्कर के आधे पेज में 8 कॉलम में विस्तारित है और पूरा आलेख आपकी रुचि को समाप्त कर देगा परंतु यहां कुछ महत्वपूर्ण बिंदु ही प्रस्तुत किए जा रहे हैं रामनवमी की आपको बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं
संकलन- एक राम भक्त

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