पुनः मूषक भव….
….आज बड़ा पर्व है ऑफिस में बड़े बाबू याने कार्यालय के अधीक्षक सेवानिवृत्त हो रहे हैं. इसलिए 15 वर्षों से इस महत्वपूर्ण महकमे के पुरोधा बड़े बाबू धुरी की भांति पूरे विभाग के समस्त कर्मचारी अधिकारी और डील्स को निपटाने के सिद्धहस्त माने जाते थे आज षष्टिपूर्ति के दिन ही विदाई थी। भव्य कार्यक्रम का आयोजन उन्होंने ही आयोजित किया और संयोजित किया। कार्यक्रम चलने को चलता रहा, वक्ता अपना उद्बोधन और प्रशंसा भाव व्यक्त करते गए और बड़े बाबू शांत भाव परंतु अशांत चित्त से कार्यक्रम संचालन और अन्य व्यवस्था निगाहों से ही नियंत्रित करते रहे । अंत में बड़े बाबू हार फूल से लदे, शाल ओढ़े गलबैया स्वीकारते सम्मान और उपहारों समेत घर को विदा कर दिए गए ।
घर पर भी अप्रतिम स्वागत हुआ लड़के बहुएं पोते और पत्नी ने ढोल धमाके से स्वागत किया था पड़ोसियों के साथ षष्टिपूर्थी की बैठक हुई और जीवन यात्रा का एक बड़ा दिन संपन्न हुआ। सेवा निव्रुत्ति एक मानसिक आघात की स्थिति है क्योंकि आप पद की सत्ता से च्युत कर दिए जाते हैं परंतु मन की अवस्था उस पद और उसके संग लिपटी चासनी जैसी सत्ता का त्याग नहीं कर पाती है। जहां अफसर की एक निगाह पर सेवादार ताश के पत्तों की भांति गिरे पड़े रहते हो तो मन उसे कैसे मान लें कि आप आप चुक गए हैं । यही हुआ बड़े बाबू के संग जब महीने भर में ही पुत्र बहू और पत्नी के साथ साथ रिश्ते नाते भी साहब की अधीक्षकगीरी और आलोचनात्मक चौकीदारी से परेशान हो छिटकने लगे …
सुबह जल्दी उठो …
रात को देर तक मत जागो…
मोबाइल ना करो ….
कि पार्टी ना जाओ ….
पड़ोसी से घरोबा न करो
और ना जाने क्या-क्या।
और तो और पत्नीश्री भी तोबा तोबा करने लगी क्योंकि साहब को तो दिनभर ऑफिस में आदेश ही देना होते थे और वहां तो वेतनयाफ्ता अर्दली बड़े बाबू की चिलम भरते थे। यहां अर्दली तो थे नहीं और बहुएं एक सीमा तक लिहाज करती रही विद्रोह हो गया 1 दिन। पत्नी ने भी रात में ठंड रख कर अफसर को समझाया कि अब तो आपकी उपस्थिति भी परिजनों को खटक रही है।
शोकमग्न हो गए बड़े बाबू…. मौन हो गए।
…. मौन होना एक कुशल साधना है जब आप मौन हो तो विचार दौड़ते चले आते हैं. एक अच्छा फिल्टर लगा ले तो सारे नकारात्मक विचार और कुत्सित विचार हटा दो तो पुण्य विचार सही दिशा दे देते हैं ।
सुबह उठते ही बड़े बाबू जी ने ऐलान किया कि मेरा टिफिन बना दो आज ऑफिस जाना है पेंशन केस का निपटान करने। पूरा घर मशीन की भांति खुशी-खुशी कामकाज मे लग गया। पुराने दिन आ गए हैं जब बड़े बाबू रोज अपने उपनगर मऊ से 20 किलोमीटर दूर इंदौर ऑफिस में ड्यूटी पर जाते थे। दिन भर के लिए घर में सुख शांति पसर गई जैसे ही बड़े बाबू घर से निकले । बड़े बाबू की इज्जत सम्मान बढ़ गया है क्योंकि वे रोज ऑफिस के नाम से इंदौर निकल जाते हैं कभी अपने पुराने ऑफिस जाकर सहकर्मियो से बतियाते, कभी एक पुराने मित्र के घर, कभी कृष्णपुरा छत्री पर बैठक, कभी राजवाड़ा तो कभी थिएटर पूरा दिन पैदल चप्पल चटकाते आत्मा को मनोरंजन कराते। भूख लगे तो दोपहर का भोजन कहीं भी पार्क बगीचे में बैठकर शांति से पाते और सूरज ढलते ट्रेन पकड़ कर सीधे घर ।
पूछ परख मान सम्मान पूर्ववत हो गया और शांति पसर गई चहुँओर

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