कोई जमाना था जब भरत के मध्यम वर्ग में पैसे की इतनी नदियां नहीं बहा करती थी और लखपति व्यक्ति होना नितांत दिवा- स्वपन जैसा समझा जाता था कि जैसे तैसे दो कमरे का मकान बन जाए तो लखपति हो जाएं
समय बदला, बच्चों ने और परिवार ने मेहनत की. खेत खलियान हरियाये, प्रतिभा सम्पन्न बच्चे पूरी दुनिया में फैले, सेवा क्षेत्र बढ़ा, मशीन उत्पादक देश बना और वित्त तंत्र ने करवट ली.
वित्त के आंकड़ों ने करवट ली तो अब मध्यम स्तर के नगर में भी मकान हो तो आदमी करोड़पति है और सड़क पर चलने वाला हर व्यक्ति या घर में रहने वाली हर महिला जो धारण करते हैं वह लाख रुपए से ही अधिक हो जाता है.
चाहे आप वह हाथों में पहनी हुई अंगूठियां हो, गले में पहना हुआ सोने का हार हो, नग हो, हीरे हो, जेब में पड़ा पर्स हो या इलेक्ट्रॉनिक गैजेट जैसे कलाई में घड़ी हो अथवा स्मार्टफोन ही क्यों ना हो, ना ना करते लाख रूपये के मूल्य का हर क्षण में वाहक हो जाता है
कितनी तेज गति से समय बदला कि अब चलता फिरता व्यक्ति लखपति है.
विचार कीजियेगा

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