अनुभव
मेडिकल कॉलेज के गर्ल्स हॉस्टल के सामने से एप्रन पहने 3 लड़कियां दौड़ पड़ी सड़क किनारे। सुबह के 9 बजने में कुछ ही मिनट बचे है और मेडिकल कॉलेज की क्लास में पहुँचने में 10 मिनिट से कम नहीं लगेंगे।
दौड़ पड़ी नवयौवना शिक्षार्थी क्योंकि आगे बैठने की जगह अब मिलेगी नहीं और सीढ़ीनुमा कक्षा के पिछले दरवाजे से घुसते घुसते प्रोफेसर महोदय का कोप कब टूट पड़े, कोई जानता नहीं।
और दौड़ पड़ीं ये कल की डॉक्टर, मेरी कार के सामने से… रोक ली कार मैने देखकर अपनी बेटी जैसी बच्चियों को दौड़ते हुए।
अजनबी होकर भी, कार का कांच नीचे किया पूछा अंग्रेजी में, क्या मेडिकल स्टूडेंट हो?
जी हां, उत्तर मिला।
मैं पूछ बैठा, छोड़ दूँ तुम्हें कॉलेज तक, मैं भी डॉक्टर हूँ। पीछे खडी लड़की ने सहमति का बहुमत बनाने के लिए सहेलियों को देखा।
त्वरित जवाब मिला बीच वाली लड़की से, नहीं….थैंक यू।
और मैंने कार आगे बढ़ा दी।
कहीं पोर से मेरी आँखें गीली हो आईं कि बच्चियों का कितना भरोसा खो दिया हमने। हमवतन, हमराही, हमसाया, हमपेशा किसी का भरोसा न रहा।
कार से दूर होती गई ये छोरियां, जैसे मैं पीछे के कांच में इन्हें देखा, दौड़ते हुए फिर से।
तस्वीर धुंधला गयी लेकिन दौड़ पड़ी बच्चियां, समय पर क्लास में पहुँचने को।
समाज हमारा , छोड़ आया भरोसा

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