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सेक्स शिक्षा के संबंध में वैसे तो चर्चा होना, समाज का विषय नहीं है बल्कि यूँ कहा जाए कि एक वर्जित क्षेत्र है तो अतिशयोक्ति न होगी और उस पर हिंदी सिनेमा प्रयोग करते हुए महाकाल की नगरी से ओ. माय. गॉड. टू नामक चलचित्र बना दे जिसमें सेक्स शिक्षा से संबंधित निर्देश दिए जा रहे हो तो यह निश्चित रूप से भारत के परिदृश्य में एक बड़ा परिवर्तन होते दिख रहा है. अक्षय कुमार, ओएमजी चलचित्र की प्रथम श्रंखला में भगवान के ठेकेदारों से आगे बढ़ते हुए नई पंक्ति में हस्तमैथुन और इंटरनेट पर भरोसे गए सेक्स संबंधी अनाचारों, विकारों और समाचारों के संबंध में इस नए चित्र के माध्यम से निश्चित रूप से एक प्रयोग धर्मी एवं कलात्मक चलचित्र का निर्माण कर समाज में एक नई अलग जागने का कार्य किए हैं. वैसे तो कथानक पूर्ण रूप से अद्वितीय और स्वीकार्य है अपितु निर्देशन और अभिनय के बिंदुओं पर भी एक नए मानक को स्थापित करता है. पिता रूप में पंकज त्रिपाठी, प्रतिद्वंदी अभिवक्ता यामिनी गौतम और शिवगण रूप में अक्षय कुमार की उपस्थिति इस यौन शिक्षा के चलचित्र में दूध में शर्करा की भांति घुली हुई प्रतीत होती है. इसमें कोई दो मत नहीं है कि युवा होते बच्चे आज के इस इंटरनेट के दौर में बड़े होने से पहले ही यौन संबंधी वीडियो तथा कहानियों से अनावृत हो जाते हैं और शिक्षण संस्थानों की ओर से वैज्ञानिक आधार पर यौन शिक्षा का प्रस्तुतीकरण कहीं पिछड़ जाता है. इस चलचित्र का संदेश बच्चों के माता-पिता के लिए भी शिक्षाप्रद है कि पिता तो बने ही, मित्र भी बने तो न केवल बच्चे अपनी जिज्ञासाओं का निराकरण घर में कर पाएंगे बल्कि कुंठित होने से भी बचेंगे. आखिरकार घर ही तो पहला विद्यालय है और लड़कियों को तो आमतौर पर उनकी मां इस प्रकार की आधारभूत शिक्षा साझा करती हैं परंतु यह सत्य है कि पिता कहीं अपने पुत्र को यौन शिक्षा के संबंध में कोई भी जानकारी देने में निश्चित रूप से पीछे रह जाते हैं. ओ.एम.जी.-2, भारतीय समाज के लिए एक अद्भुत दर्शन है और भारतीय समाज के लिए यह एक पाठ भी है कि परिवर्तन जीवन का एकमात्र स्थाई नियम है और जिसके चलते रुक नहीं जाना है आगे बढ़ाने के अविरत प्रयास जारी रखे जाने चाहिए.
इसके साथ ही उज्जैन के महाकाल मंदिर का सजीव चित्रण बहुत दर्शनीय एवं लोमहर्षक बन पड़ा है जो भस्म आरती के एवं निर्मल दर्शन तो करता ही है, हाथ जोड़कर श्रद्धा से बैठने पर मजबूर भी कर देता है. ईश्वर में आस्था का बड़ा सजीव चित्रण प्रस्तुत किया गया है, परंतु मानव मन की कमजोरी का चित्रण भी प्रस्तुत है जिसमें ईश्वर की उपस्थिति को जानकर भी ईश्वर पर भरोसा न करने की मानवीय कमजोरी भी परिलक्षित होती है जो बड़ी ही मायावी प्रतीत होती है. सच ही कहा है कि कण कण में भगवान है पर क्षण भर को विश्वास नहीं है.

संदेश यह भी है कि आपके पुत्र पुत्री के मन में घटित हो रहे विकारों को आप समय से पकड़ सके अन्यथा यह नाजुक और कोमल मन के युवा होते युवक युवती अपनी गलती पूर्ण रूप से मानकर आत्महत्या जैसे कदम उठाने को भी तैयार हो जाते हैं.
एक छुपा हुआ संदेश भी प्रस्तुत किया गया है कि दो पहिया वाहन चलाते समय सिर्फ हेलमेट को सिर पर रख लेने से सिर की सुरक्षा नहीं होती है. हेलमेट को बांधना भी पड़ता है जो एक अच्छा संदेश है और जिसका पालन युवाओं को अवश्य करना चाहिए ताकि रोड ट्रेफिक एक्सीडेंट में हैड इन्जुरी होने वाली मौतों से बचा जा सके.
संदेश यह भी है कि युवकों को विज्ञापन आधारित सेक्स ज्ञान के स्थान पर वैज्ञानिक आधार पर सेक्स शिक्षा पर लिखित पुस्तकों का पठन करना अधिक उत्तम होगा. गूगल सदैव सहायक नहीं होगा.

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