वरदान –
मांगो वरदान, प्रकट हो भगवान बोल बैठे एक नास्तिक से.
आश्चर्य में डूबे नास्तिक के नैन, हृदय, मस्तिष्क सब चुंधिया गए, विचार शून्य हो जैसे अंधकार में अंधे हो गए हो. ज्योतिपुंज से आलोकित निराकार ऊर्जा रूप में भगवान, नास्तिक की भाषा में फिर बोले…

मांगो वरदान,
अभक्त तो जैसे बस किंकर्तव्यविमूढ़ हो तकते रहे, आश्चर्य से निहार तो लूं यह विज्ञान की माया जो नॉर्दर्न लाइट्स जैसी हो और वाणी भी पा गई हो.
विस्तारित नैन, स्तब्ध मस्तिष्क और धड़कते हृदय के घाल-मेल में प्राण जैसे इस माया को देख शरीर छोड़ने को आतुर.
जैसे तैसे समेटे विचार, शून्यता से माया लोक में वापसी की और तन मन धन के प्रति अपनी वासना को समेटा और छोटी सोच से सोचने लगे,
100 करोड़ मांग लूं
सदैव का यौवन मांग लूं अपार यश मांग लूं या
सदा के लिए सत्ताधीश बने रहने का वर मांग लूं
कुछ सोच, बोल उठे आखिरकार नास्तिक महोदय
प्रभु मेरे ईश्वर की अवधारणा को विज्ञान से जो आपने धन्य किया और ज्योति पुंज और वाणी से मुझे शुभ दर्शन दिए निवेदन है आदरणीय कि जीवन का रहस्य समझा दीजिए
प्रभु बोले सबसे पहले सूर्य को समझा चुका हूं और अर्जुन को भी सुना चुका. अब आप भगवद्गीता का पाठ करो सारी शंकाएं निर्मूल होंगी.
समाज की व्यवस्था भ्रष्ट और मलिन हो चुकी है प्रभु उपाय बताएं?
नास्तिक महाराज ने प्रश्नावली जारी रखी!
प्रभुजी बोले,
रामायण का पाठ एक कहानी नहीं मानव जीवन की नैतिक शैली का ककहरा है.
लक्ष्मण रेखा
भातृ प्रेम
मातृ सेवा
नैतिक भाव
श्रमदान
सहयोग
मित्र भाव
कर्म फल
काल प्रभाव
सब शिक्षा तो है राम कथा में. स्वीकार करो तो, ना करो तो भी अनुकरनीय है समाज व्यवस्था हेतु.
नास्तिक निरुत्तर मौन अकल्पनीय शून्य से पीड़ित जैसे माया मिली ना राम
और ईश्वर अंतर्ध्यान हो गये
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