Konark, Worthy place.

अहोभाग्य कोणार्क, द्रष्टि हटाये न हटे!

इतिहास हमारी धरोहर है और इस युग में रहते हुए कुछ पल के लिए इतिहास में परे जा कर इतिहास को जी लेना एक साहसिक पर्यटन है. जगन्नाथ पुरी के पास भुवनेश्वर ( उड़ीसा ) में सूर्य मंदिर कोणार्क 800 साल पुरानी एक अनमोल धरोहर का प्रतीक है जहां विज्ञान के शाश्वत नियम की, 800 वर्ष पूर्व के मानव समाज के ज्ञान की अनुभूति की जानकारी होती है और आप विस्मृत होकर जब ऐसी विहंगम रचना का अवलोकन करते हैं जो उस काल में बिजली और वाहन के उपागम और संसाधन ना होने के बाद भी भारत के महामानवों ने कोणार्क के सूर्य मंदिर जैसी रचना हमारे लिए स्थापित कर दी.

कोणार्क की यह हमारी ऐतिहासिक संपत्ति, यूनेस्को द्वारा 1984 से विश्व विरासत है, इस विश्व की धरोहर है. कोणार्क संस्कृत से लिया गया शब्द है…… कोण और आर्क याने सूर्य अर्थात सूर्य का ऐसे कोण पर मंदिर की स्थापना. भव्यता के साथ पूर्व दिशा से उगते सूर्य उदय के समय, जब मंदिर अपने पूर्ण स्वरूप में अपने सुंदर स्वरूप में प्रस्तुत होता है, तब सूर्योदय के समय एक विशेष समय पर सूर्यदेव की किरणें एक कोण से मंदिर के गर्भ ग्रह को सूर्य की किरणें अपने आलोक से आल्हादित कर देती थी इसलिए इस संस्कृत शब्द से इस स्थान मंदिर का नाम कोणार्क रखा गया. उड़ीसा के समुद्र तट अनादिकाल से एक प्रमुख बंदरगाह था. इस सूर्य (अर्क) की महारचना की स्थापना पूर्व गंग राजा नरसिंहदेव प्रथम १२३८ – १२६४ के द्वारा की गई थी.

….. लगभग 12 वीं और तेरहवीं शताब्दी के मध्य निर्मित इस विशाल मंडप में मंदिर के अद्भुत कल्पना और इस अति-विशाल रचना को समझने का प्रयास करेंगे तो आप पाएंगे कि विशालकाय रचना किसी विशाल रथ के 12 जोड़ी याने 24 पहियों पर स्थित है यह मंदिर जिसे सूर्य मंदिर कहा जाता है और इन 12 पहियों के माध्यम से सात घोड़े जिनके अलग अलग नाम हैं इस रथ नुमा मंदिर की संरचना को खींच रहे हो…… ऐसा विहंगम दृश्य प्रस्तुत होता है यदि दूर से सूर्योदय के समय आप इस मंदिर का समग्र द्रष्टि के द्वारा जी भर के देखने का प्रयास करें तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे यह मंदिर जमीन के नीचे से उगता हुआ चला आ रहा है. यह दर्शन समग्र रूप में अहोभाग्य जैसी अनुभूति देता है कि ऊर्जा के एकमात्र स्त्रोत महाप्रभु सूर्य के सम्मान में उस 13 वीं सदी के महामना और वास्तु ओजस्वी मनीषियों ने और कलाकारों ने अपनी दुर्लभ और विलक्षण दृष्टि व प्रतिभा से ऐसी रचना बनाई जो आज भी सूर्य की किरणों से समय की गणना में लगभग आदर्श गणना कर लेती है और के पत्थरों में उकेरी मूर्तियों की सुंदरता इतनी अभिनव है कि …..दृष्टि हटाए ना हटे. मंदिर के निर्माण की दिशा पूरब पश्चिम है और मंदिर के चारों ओर दीवारों पर रथ के 12 परियों के अतिरिक्त मानव के विभिन्न रसों से ओतप्रोत पत्थर पर उकेरे गए मूर्तिचित्र हैं जो अत्यंत आकर्षक और दर्शनीय हैं।

शायद आपको जानकर आश्चर्य हो की मूर्तियां जो प्रदर्शित हैं चारों ओर की दीवारों में उन में सूर्य की तीन मूर्तियां दूर से ही बड़ी सुंदर प्रतीत होती हैं और इसके अतिरिक्त उस काल के समाज की मानसिक द्वंद, वैभव और कला को समान रूप से पत्थर पर उकेरा गया है जैसे एक फ्रेम में एक छोटा बच्चा जिसके घुंघराले बाल हैं कि हंसते चेहरे पर एक-एक दांत भी अति सुंदर दिखते हैं ( चित्र देखें ) .एक पत्थर के फ्रेम में हाथी के साथ जिराफ का चित्र भी है. जैसा कि हम जानते हैं कि जिराफ अफ्रीका का जंतु है और उस जमाने में अफ्रीका तक कोणार्क के राजा का व्यापार फैला रहा होगा और यहाँ के राजा को, वहां के राजा ने या व्यापारी ने यह भेंट स्वरूप जिराफ दिया होगा. मंदिर की भित्तियों पर दैवीय के अतिरिक्त मानव, पेड़,पौधे, जीव- जन्तुके साथ साथ ज्यामितीय अलंकरण बहुतायत से हैं. कन्याओं, नर्तकियों और वादकों की शारीरिक संरचना, अलंकरण एवं भाव भंगिमाएं विशेष दर्शनीय हैं. मंदिर के द्वार पर एक अलौकिक मूर्ति का जोड़ा स्थापित है जो सबसे नीचे धराशायी मानव के उपर एक हाथी और सबसे उपर एक सिंह को प्रदर्शित करता है. (चित्र देखें) इसको इस प्रकार समझा गया है कि सिंह रूपेण सत्ता सर्वोपरि है वह धन वैभव रूपी गजराज को भी काबू कर लेती है और मानव धर्म, समाज आदि…सत्ता और धन वैभव के आगे दमित हो जाते है.

……..कामकला की विभिन्न विधाएं आदि भी इन्हीं पत्थरों की मूर्तियों में प्रदर्शित होती हैं जो आश्चर्यचकित किए बिना रहने नहीं देते हैं. इन मूर्तियों में स्त्री – पुरुष, स्त्री – स्त्री और जंतुओं के साथ भी काम कला के द्रश्य प्रदर्शित होते हैं.

गर्भगृह में जाना प्रतिबंधित है क्योंकि मंदिर के भवन रचना के कमजोर होने से गिरने का भय बना हुआ है और भीतर से प्रशासन द्वारा छत को कई सहारे लगाए गए हैं। किवदंतियाँ प्रचलित हैं कि गर्भगृह में एक बड़ा चुम्बक स्थित था जिससे मंदिर की बड़ी दीवारें सुरक्षित थीं। लेकिन इस बड़े चुम्बक से पड़ोस के बंदरगाह से आने जाने वाले पानी के जहाजों से उनके कंपास में दिशाभ्रम होता था अतः ब्रिटिश काल में इस चुम्बक को तोड़ दिया गया। इस लोककथा यह भी है कि गर्भगृह में एक बड़ा हीरा अवस्थित था जिसके भीतर से सूर्य की किरणें गुजराती थीं। इस हीरे को विदेशियों ने वहां से हटा दिया। सत्यता को अब पता कर पाना लगभग असंभव है लेकिन यह तय है कि उस काल का विज्ञान भी पर्याप्त रूप से उन्नत था और मानव संसाधन, ज्ञान और दृष्टि तीनो बहुत उच्च स्तर के थे।

….ऐसा भी कहा जाता है की मंदिर वर्ष 1627 में इस मंदिर के गिरने के खतरे को भांपकर खुर्दा के राजा ने गर्भग्रह में स्थापित सूर्य की मूर्ति को जगन्नाथ पुरी के मंदिर परिसर में सुरक्षित रूप से स्थापित किया था ।

इस मंदिर के चंद्रभागा नदी के तट पर स्थापित किया गया है और आज भी सूर्य के जन्म दिवस यानी वसंत पंचमी के 2 दिन बाद यहां बड़ा मेला भरता है और लाखों भक्त जन इस चंद्रभागा के जल कुंड में स्नान पवित्र स्नान करते हैं. .

….यदि आप सुबह के समय इस कोणार्क मंदिर की यात्रा करें और एक अच्छा गाइड कर लें तो आपकी वैचारिक भूख कम ना होगी बल्कि बढ़ जाएगी जब अच्छा गाइड इस सूर्य मंदिर के रथनुमा पहियों पर की धुरी पर सूर्य की रोशनी से 1 मिनट के अंदर तक गणना कर बता देता है और जब आप अपनी घड़ी देखते हैं तो उस समय आप आश्चर्य चकित हुए बिना नहीं रहते कि आज से 800 वर्ष पूर्व भी विज्ञान अपने चरमोत्कर्ष पर था …. आधुनिकता तब भी थी और लोगों की बुद्धि का स्तर, विज्ञानं के प्रकारांतर उपयोग भी अत्यधिक उच्च स्तर पर था जो भौतिक, रसायन और गणितीय ज्यामितीय ज्ञान का उच्च बुद्धि स्तर था …. जिसे कालांतर में भुला दिया गया या दुर्भाग्यवश काला-पहाड़ जैसे मुगल अतिथि – आततायी द्वारा नष्ट कर दिया गया. ब्रिटिश काल में अंग्रेजों ने इस मंदिर के संरक्षण हेतु बहुत प्रयास किया गया है.

……नए प्रचलन में आए दस के नोट में भी इस कोणार्क मंदिर के एक पहिए का चित्र सजीव चित्र दिखाई पड़ता है आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने इस राष्ट्रीय एवं विश्व धरोहर को बचाने का महती प्रयास किया है लेकिन संभवत अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है क्योंकि इस मंदिर का सौन्दर्य अप्रतिम है जो आपके परिकल्पना को नया आयाम देकर नयी ऊँचाई प्रदान करता है….कोणार्क की यात्रा आपकी आकांक्षा सूची में होना ही चाहिए

Konark Gate Show

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