DhoulaVeera: Ancient City

अजीब है, धौला वीरा….

गुजरात के सबसे बड़े ज़िले कच्छ में है छोटी सी जगह धौला वीरा कुछ ऐसी अजीब, जो समेटे है कुछ प्रागैतिहासिक, कुछ पुरानी सभ्यता जो 5000 साल पहले से इस आर्यावर्त का हिस्सा है, वैज्ञानिक रूप से उन्नत सभ्यता के अवशेष जहां प्रचुरता में हैं, वहीं साइबेरिया के हजारों फ्लेमिंगो सफेद रण में उपस्थित है आपके मन को लुभाते हुए जबकि ये जगह भारत का एक टापू सदृश्य है जो भारत से जोड़ने वाली सड़क से रण के झील से दोनों ओर से घिरी हुई है।

अजीब है ये जगह…

धौलावीरा, भारत में स्थित सबसे बड़ा हड़प्पा स्थल है। अब एक छोटे से कस्बे में तब्दील धौलावीरा से
सबसे समीप नगर भी 80 किलोमीटर दूर है, रहने को मात्र 2 या 3 रिसोर्ट हैं जो ग्रामीण परिवेश में ठेठ देसीपन समेटे हुए, गुजराती भोजन के निपट देशी स्वाद से साक्षात्कार कराते हैं। यहां का किसान जीरे और इसबगोल की भूसी की नगद पैदा करने वाली खेती कर रहा है। इलाके में जंगली गधे और नील गाय बहुतायत में हैं जो टूरिस्ट का आकर्षण हैं लेकिन यात्रा में जगह जगह पर फ्लेमिंगो, पेलिकन, सीगल जैसे कई दुर्लभ प्रकार के पक्षीदर्शन छोटे बड़े सरोवर में होते हैं जो पक्षी प्रेमी के लिए किसी 56 भोग की दावत से कम नही है। और धौलावीरा के सफेद रण में तो 3 से 4 इंच पानी के स्तर पर झील में जब हजारों की संख्या में फ्लेमिंगो इस सर्द मौसम में दिखते है तो प्रकृति की ये लीला देख उसके अजूबे का अहसास होता है कि क्या अलौकिक लीला है ये।

गुजरात के 2001 के भूकंप में जमीन के भीतर दबे प्रागैतिहासिक पत्थर चट्टान के टूट कर ऊपर आ जाने के कारण, धौला वीरा का नाम 187 मिलियन वर्ष पूर्व तक दर्ज हो गया। क्योंकि इस टूटे हुए चट्टान के भीतर एक करोड़ो वर्ष पुराने पेड़ ( वुड फॉसिल) की उपस्थिति दर्ज की गई है। कार्बन डेटिंग से इस जीवाश्म व्रक्ष की आयु 187 मिलियन वर्ष पूर्व की आंकी गई। ऐसी धरोहर के साक्षात दर्शन आपको आश्चर्य चकित कर देते हैं।, मंत्र मुग्ध हो कर आप देखते रह जाते है कि कितना पुराना इतिहास है आपका। वहीं पास में 8 किलोमीटर दूर आपको अशोक के काल से भी पूर्व की हड़प्पा की सभ्यता के अवशेष मिल जाते है जो दुनिया के सबसे पुराने साइनबोर्ड का साक्षी है। धौलावीरा जल निकासी, जल संरक्षण और अनाज संरक्षण के ऐसे दृश्य प्रस्तुत करता है जो आपको विस्फारित नैनो से देखते हुए ये सोचने को मजबूर कर देता है कि हमारी सभय्या कितनी आदिकालीन है, और आज की आधुनिकता के कितने करीब है जब आप नगर विन्यास, स्टेडियम, द्वार चार, राजमहल के द्वार के अवशेष, हिंज कड़ी, सीढ़ी विन्यास, दीवार का 90 डिग्री पर विन्यास, सीधी सड़क मार्ग, ताँबे के तीर नोंक, अंगूठी, मिट्टी के घड़े, खरल औऱ अब तक अपठनीय साइन बोर्ड जो दुर्ग के विशाल द्वार पर लगा रहा होगा, के साथ कई छोटी सील या मुद्रांकण जब देखते है तो एक अजीब भाव उत्पन हो जाता है कि आज हम और हमारी सभ्यता उन्नत है या 5000 साल पूर्व की यह सभ्यता उन्नत थी जब सीमित संसाधनों के रहते उस समय भी मजबूत ढांचा तैयार का लिया जाता है जो आज इतने वर्षों बाद भी अपनी उपस्थिती दर्ज कराने में सक्षम है।
धौलावीरा एक विश्व धरोहर है जो मानव सभ्यता के हड़प्पा काल के 5 बड़े पुरास्थलों जैसे हड़प्पा, मोहेजो डरो, गनेरीवाला, राखीगढ़ी और गुजरात में लोथल व धौलावीरा सिंधु घाटी की सभ्यता के महानगरीय शेष-प्रतीक है। धौलावीरा की खोज 67-68 में हुई जबकि इस पुरातन स्थल का उत्खनन 1990 में पूर्ण हुआ। कच्छ जिले के खदिर द्वीप में स्थित है धौलावीरा, जिसे कोटड़ा नाम से भी जाना जाता है, लगभग 100 हेक्टेयर के क्षेत्र में फैला हुआ है
यह पुरातन हड़प्पाकालीन स्थल गुजरात के कच्छ जिले के भचाऊ तहसील में विशाल रण के मध्य में स्थित है।

धौलावीरा की विशेषता है यहां का एक विशाल समानांतर चतुर्भुज योजना के रूप में बसाया गया नगर विन्यास जो चारों ओर ऊंची दीवारों से घिरा था। लगभग 770 मीटर लंबा और 620 मीटर चौड़ा यह दुर्ग क्षेत्र मध्य वर्गीय और निम्नवर्गीय नगर में विभाजित था। धौलावीरा व्यापार का मुख्य केंद्र था और इस नगर का निर्माण चौकोर व अयताकर पत्थर से हुआ है। सिंधु घाटी के अन्य नगरों में कच्ची पक्की ईंट का प्रयोग हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि सिंधु नदी यहीं समुद्र में मिलती थी किन्तु भूकंपों के कारण सम्पूर्ण क्षेत्र ऊंच नीच हो गया और सिंधु नदी का प्रवाह बदल गया जो अब पाकिस्तान में है।

धौलावीरा के उत्खनन में एक विशिष्ट नगर योजना, स्मारकीय संरचना, सुरुचिपूर्ण वास्तुकला और विस्मित करने वाली जल व्यवस्था से परिपूर्ण एक अद्वितीय नगर के अवशेष प्रकाश में आये थे।इस पुरास्थल से हड़प्पा संस्कृति के क्रमिक उत्थान एवं पतन के प्रमाण उजागर होते हैं। धौलावीरा की अद्भुत विशेषता यह है कि हड़प्पाकालीन सिंधु लिपि के 10 विशाल आकृति के अक्षरों का सूचना पट्ट है जिसे सम्भवतः इस विश्व का सबसे प्राचीन सूचना पट्ट होने का गौरव प्राप्त है। इस लिपि को आज दिनांक तक पढ़ा नहीं जा सका है। यह अनुमान है कि यह साइन बोर्ड संभवतः महानगर का नाम या राजा का नाम या नगर जनों का स्वागतचिन्ह है। इसीलिए धौलावीरा विशिष्ट भी है।

धौलावीरा की अन्य अद्वितीय विशेषता है, उत्खनन से प्राप्त जलाशयों की श्रृंखला जो स्वच्छ जल संग्रहण के उपयोग में आते थे। चौकोर नालियों द्वारा जल , जलाशयों तक लाया जाता था। ये जलाशय भूगर्भीय चट्टान को काटकर , पत्थर और गारे से निर्मित किये गए थे। ये जलाशय सीढी के साथ अपनी पहुंच मार्ग को भी प्रदर्शित करते हैं।
जलाशयों की इस व्यवस्था के कारण शुद्ध जल की आपूर्ति होती थी जो हड़प्पाकाल के इन नगरों की शुद्धजल प्रदाय की उन्नत व्यवस्था थी।

धौलावीरा के इस दुर्ग के प्रवेश द्वार के अवशेष आपको विस्मित कर देते हैं जहाँ धुरी के पत्थर अवशेष और हिंज अवशेष उस काल के विज्ञान के विकास से आपको परिचित करा देते हैं।

राजशासन व्यवस्था हेतु पशु हड्डी से बनी स्केल मुद्रा, मुद्रांकन आज की सील व्यवस्था से कतई कमतर नहीं महसूस होते हैं। धौलावीरा में एक म्यूजियम भी स्थित है जहां इस पुरातन स्थल से प्राप्त मटके, मुद्रांकण, तीर, आभूषण संरक्षित हैं जो हमारी सभ्यता के अनादिकालीन होने से हमें परिचय कराते है।
बहु आयामी समृद्ध सभ्यता अपने पूरे वैभव में प्रचुर मात्रा में कलात्मक मृद भांड, कलात्मक मुद्रायें, तोल के बांट, लिपिगत लेख, शंख, तांबे की चूड़ियां, उपरत्न, तांबे और मिट्टी के मनके, शंख के बने विविध आभूषण से आपका विस्मयकारी परिचय कराती है।

हम आज विकसित हैं, परंतु, धौलावीरा देखकर लगता है कि हमारे पूर्वज भी विकसित थे। प्रवास कीजिये, धौलावीरा का आप चमत्कृत हो जाएंगे।
जल निकास व्यवस्था भी धौलावीरा के विशिष्ट पहचान है जहां दुर्ग और भवनों से जल निकास होकर मृद भांड या मटकों में एकत्र किया जाता था। नगर विन्यास पूर्व से पशचिम की ओर है जो वास्तु सम्मत प्रतीत होता है। कोई धार्मिक स्थल न पाए जाने के अतिरिक्त ऐसी क़बरें या समाधि पाई गई हैं जिनमें अस्थि के कोई अवशेष नही मीले हैं। एक कब्र में कई मटकों में अस्थि अवशेष मिले है जो संभवतः मृत देह के अग्नि संस्कार पश्चात अस्थि संग्रहण करने की परंपरा के उस काल में प्रचलित होना दीखाते हैं।

धौलावीरा की सबसे आश्चर्य जनक बात है इस नगर में किसी भी प्रकार के धार्मिक स्थल या निशान या चिन्ह नही मिले है, क्या यह स्वयं देवताओं की नगरी थी या देव अपने सबसे प्रारंभिक काल में यहां धौलावीरा में बसते थे, यह अनुमान लगाना असंभव ही है। क्या ऐसा नहीं प्रतीत होता कि 5000 साल पुरानी हमारी यह सभ्यता हमसे भी उन्नत थी जहां ईश्वर नामक संस्था या ईश्वर की आराधना का कोई स्थान नहीं था या जीवन के पांच महाभूत तत्वों अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश को ही पारलौकिक माना जाता था। इस धौलावीरा संस्कृति के पतन का समय संभवतः 2200 ई पू से 2000 ई पू तक रहा होगा।

इसीलिए धौलावीरा एक अजीब एवं दर्शनीय संपदा सिद्ध होती है।

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