Bagh Caves Dhar MP

बौद्ध गुफाएंबाघ टांडा धार की धरोहर

अनादि काल से भवन निर्माण प्रयोग का विषय रहा है परंतु रहवासी भवन की कल्पना से कहीं जटिल है किसी ध्यान- स्थल की रचना करना और जब बात आज से 1600 वर्ष पूर्व की हो तो कल्पना के दायरे में आज का मानस उस काल के मानस के समक्ष ध्वस्त ही हो जाता है. पहाड़ों को छैनी-हथौड़े से छीलकर 25 फुट ऊंची छत वाली 9 गुफाएं बनाना उस पर पहाड़ों का करोड़ों टन का भार सहन करने की अवधारणा को धरातल पर उतारने के लिए 3 – 4 मीटर व्यास के कई खंभे खड़े करना, विस्मित कर देता है.

… जी हां मैं बात कर रहा हूं मध्य प्रदेश के पश्चिम स्थित बाघ गुफाओं की… जो धार जिले में स्थित है और समीपस्थ हवाई अड्डे इंदौर से लगभग 170 किलोमीटर दूर हैं. पांचवी-छठी शताब्दी में निर्मित यह बौद्ध गुफाएं निश्चित रूप से ईश्वर की प्राप्ति के लिए या जीवन के रहस्य को समझने के लिए बनाए गए एकांतवास हैं या ध्यान- स्थली हैं कहना मुश्किल है. यहां 180 मीटर लंबाई और 30 मीटर के चौड़े क्षेत्र में बाघनी नदी के किनारे ये 9 गुफाएं स्थित है.
यहां के स्थानीय ग्रामीण इन गुफाओं को अति प्राचीन मानते हुए पांडु – गुफाएं भी कहते हैं और इसके प्रमाण भी साधारण तौर से ही अपनी उपस्थिति से प्रदर्शित कर देते हैं. मुख्य गुफा के सामने स्थित आंगन में पूर्ण शिवलिंग के साथ मुख्य गुफा के द्वार पर खंडित महादेव जी की मूर्ति तथा खंडित गणेश प्रतिमा से यह प्रतीत होता है कि अपने 12 वर्ष के वनवास काल में पांडु पुत्रों ने कुछ माह का समय संभवत यहां व्यतीत भी किया हो.


बौद्ध पंथ के महायान ।मतावलंबियों द्वारा पांचवी – छठी शताब्दी में इन गुफाओं की रचना का उल्लेख मिलता है. ऐसा विश्वास है कि एक बौद्ध भिक्षु डाकता ने इन बाग गुफाओं की स्थापना की थी .इन गुफाओं के प्रस्तर पर उकेरी गई भित्ति-चित्र किसी भी दर्शक के मन को मोह लेने के साथ आश्चर्यचकित कर देते हैं. उस काल की वनस्पतियों की छाल, फूल-पत्ती, जड़ आदि से बने ये भित्ति-चित्र अद्वितीय है और महाराष्ट्र के अजंता में स्थित भित्ति चित्रों की कला वीथिका का किंचित आभास करा देते हैं. इन्हीं गुफाओं के केंद्र में बड़ी बैठक है जिसकी छत के ऊपर हजारों टन भट के साथ पर्वतराज विराजित हैं. बैठक के चारों ओर छोटे कमरे में रचनाएं हैं जो संभवतः ध्यान के उपयोग में लाने के शांत स्थल हैं जिन्हें चैत्य भी कहा जाता है. सबसे भीतरी कक्ष में विशाल गुम्पा स्थित हैं जो संभवत दिवंगत पूर्व बौद्ध भिक्षु एवं संतों के स्मरण स्थल हैं.
गुफा क्रमांक एक क्षतिग्रस्त है जबकि गुफा क्रमांक 2 से क्रमांक 7 विहार योग्य हैं अन्य गुफाओं में भी विचित्र चित्र आपका स्वागत करते हैं जबकि कमरों की रचना कमोबेश एक जैसी ही है. गुफा क्रमांक 2 लगभग अपने मूल रूप में संरक्षित है जिसे पांडव गुफा का नाम भी मिला हुआ है. विंध्याचल की इन पहाड़ियों में सेंड स्टोन से बनी यह गुफाएं पानी के निरंतर रिसाव से अपने मूल स्वरूप को खो चुकी हैं तथा भित्ति चित्र भी नष्ट प्रायः प्रतीत होते हैं. पुरातत्व विभाग ने इन भित्ति चित्रों की धरोहर को सहेजने के लिए इन चित्रों को आधुनिक विधा से गुफा की दीवारों से पृथक कर लिया है और इन्हें संग्रहालय में संरक्षित भी कर लिया है. यह चित्र आध्यात्मिक तथा भौतिकवाद दोनों से संबंधित प्रतीत होते हैं जिनमें कमल के फूल, गाय बैल इत्यादि दिखते हैं. इन गुफाओं में यदा-कदा यहां के स्थाई रहवासी भी आपका स्वागत करते हैं जो उड़न राडार चमगादड़ ही है.

बाघ एक छोटा कस्बा है जो कुक्षी तहसील में मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग 340 किलोमीटर दूर स्थित है. बाग गुफाओं की तिथि के संबंध में महाराज सुबंधु के ताम्रपत्र अभिलेख प्राप्त है जिसमें विहारों के रखरखाव और टूटे हुए भागों की मरम्मत हेतु दाशीलकापीली के पाठक में स्थित एक ग्राम के अनुदान के पंजीयन का उल्लेख मिलता है इसमें विहार का नाम कल्याण लिखा है. यह अभिलेख महाराजा सुबंधु द्वारा माहिष्मती नगर से जारी किया गया था जिसकी पहचान आज नर्मदा नदी के किनारे स्थित महेश्वर नगर से की गई है एवं विहार की पहचान बाघ गुफाओं से की गई है. माहिष्मती महाराज सुबंधु के बड़वानी से प्राप्त ताम्रपत्र में कलचुरी चेदि वर्ष 167 याने 249 ईसवी के आधार पर ताम्रपत्र पर अनुदान की तिथि निर्धारित हुई है. इंदौर से आगरा मुंबई हाईवे पर खलघाट से दाएं 90 किलोमीटर सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचने योग्य है जबकि समीपस्थ रेलवे स्टेशन मेघनगर है जो 80 किलोमीटर की दूरी पर है. एक अन्य मार्ग से इंदौर – झाबुआ-अहमदाबाद नेशनल हाईवे 47 मार्ग पर सरदारपुर से बाएं टांडा मार्ग पर 40 किलोमीटर की दूरी पर बाघ की गुफाएं स्थित है. यह मार्ग घुमावदार तथा अच्छी सड़क के साथ साथ चारों ओर हरियाली की अनुपम सौगात प्रस्तुत करता है जो ऊंचे नीचे रास्ते तथा घाटियों के मध्य से गुजरता है.

बाघ नगर की एक अन्य विशेषता, व्यावसायिक है जो वहां के स्थानीय लोगों ने विकसित की है जिसे बाघ प्रिंट के नाम से जाना जाता है यह एक प्रकार का रिलीज प्रिंट है जिसमें प्रिंटिंग ब्लॉक को स्याही द्वारा कपड़ों पर हाथ से छापा जाता है. यह पारंपरिक हैंड क्राफ्ट बाघ शहर की पहचान है जो कपड़ों का प्रसिद्ध प्रिंटिंग उत्पाद है. यहां स्थित कारखाने बाग प्रिंट के द्वारा साड़ी, चादर , सूट मटेरियल , धोती आदि बनाते हैं. लगभग 1000 वर्ष पुरानी यह विधा मुस्लिम खत्री समाज द्वारा इस बाग प्रिंट को जीवित बनाए रखे हैं जो संभवतः लरकाना सिंध (वर्तमान पाकिस्तान) से आई है जिसे ब्लॉक प्रिंटिंग की विधा का जनक माना जाता है. इस प्रिंट के लिए वनस्पति जगत से पौधे फूल आदि के साथ इमली बीज व मेंगनी का उपयोग किया जाता है. शीशम की लकड़ी के बने डिज़ाइनर ब्लॉक हैं जिन पर डाई की स्याही से कपड़े पर प्रिंट बड़े मनोहारी बन पड़ते हैं जो पूरे देश में पसंद किए जाते हैं.

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