Electioneering

चुनाव – जोड़ता है कि तोड़ता….

भारत का यूएसपी अर्थात यूनिक सेल प्वाइंट है चुनाव। भारत जैसा संसाधनों से भरपूर देश चुनाव की खेती का जोरदार लाभ का व्यापार है। जहां 5 वर्षों के कार्यकाल के लिए स्वयम्भू वीर, आत्ममुग्ध योद्धा और बाहुबल के रण- बाँकुरे और संत आत्माएं अपनी भुजा और सेवा भाव का अमृत लिए चुनाव समर में कूद पड़ते हैं।

क्या जीते हुए विधायक, सांसद या नगरपालिका के पार्षद और क्या हारे हुए प्रत्याशी,अपनी सेवा भाव का अमृत आम और खास जनता को बांटने को आतुर हुए जाते हैं और शंखनाद किए जाते हैं ताकि नागरिकों का मत मतांतर का पूर्णमिदं लाभ नेता जी को ही मिले….. और अगले 5 वर्षों के लिए वे देश के संसाधनों और सत्ता की असीम शक्ति के रथ वाहक बन सकें और इस मिट्टी रूपी जनता सत्ता की यह खड़ी फसल को अविकल कटती देखती रहे।

जनतंत्र की ताकत का धनी है यह देश जहां लगभग साल भर ही चुनाव की नदियां बहती है और देश के खेवनहार, इस नदी में अपनी लाभ की फसल लगाते हैं और काटते चलते हैं। अशोक सम्राट ने जब कलिंग राज्य पर आक्रमण किया तो वहां कोई एक राजा ना था बल्कि एक नागरिक परिषद शासन करती थी जो आज के भारत में वृहद संसद के समान ही थी। उस समय भी इस परिषद का सदस्य बनने को हाथों-हाथ और हाथापाई के समान दृश्य उपस्थित होते रहे होंगे। तभी आज के भारत में भी इन दृश्यों के, नैतिक कहें या अनैतिक, स्पष्ट रूप से हम साक्षी होते हैं । संसद के 550 सदस्य फिर विधान सभा विधान परिषद के हजारों चुने हुए सेवाभावी आम और निरीह नागरिकों के सामने पहलवानी का साक्ष्य प्रस्तुत करते ही है। जनतंत्र को और मजबूत बनाने के लिए नगर निगम, नगर पालिक, मंडी सहकारी संस्था में भी इन चुनावों की अनिवार्य खेती, सम कहें या विषम, समान रूप से बोई और काटी जाpती है। तंत्र ने चुनाव के प्रशिक्षण हेतु अब तो यूनिवर्सिटी, कॉलेजों और स्कूलों तक में चुनावी जोर आजमाइश का पूर्ण प्रबंध किया है। भारत और भारत के नागरिकों का प्रियतम खेल है। जो यह खेल खेलते हैं वह तो ठीक ही है। इस चुनावी। दंगल रुपी खेल से रोजगार भी जबरदस्त पैदा होता है। घरों में जमा काले धन को भी बाहर को धूप की रोशनी दिखाई पड़ती है। इसके साथ ही चुनाव के अनिवार्य घटक हैं, भक्ति का प्रदर्शन, प्रेम का अतुलनीय प्रदर्शन, लेन देन का समुचित व्यवहार और नेपथ्य में वितृष्णा का न काम होने वाला भाव। इस के साथ-साथ, रुचिकर लोगों को नुक्कड़ पर राजनीति में रुचि रखने वाले और मूक श्रोता दोनों को समसामयिक अवसर उपलब्ध होते हैं, जो इडियट बॉक्स पर होने के साथ साथ चौपाल और पान सदन पर भी चर्चा का विषय विशेष होते हैं। महानेताशिरोमणि से लेकर महामूर्खशिरोमणि तक इस चुनावी खेल में अपना अपना खम्ब ठोकते नजर आते हैं। और तो और पूर्णकालिक नेताओं को चुनौती देते अल्पकालिक भी इस राजनीति में अपनी “दे ताली” देते हैं। कवि, अभिनेता, सट्टा खिलाड़ी, पत्रकार और ट्विटर-वीर भी अपनी-अपनी दुकानें सजाए एक प्लेटफार्म से दूसरे प्लेटफार्म पर हरषाये फिरते हैं। यह चुनाव नहीं, उत्सव है जो हिंदू को मुस्लिम से भिन्न कर देता है, गरीब को ललचाने वाली लोकलुभावन और सस्ती लोकप्रियता की चाहत के आश्वासन जैसे फ्री नाश्ता, फ्री रोटी, नगद माहवारी भत्ता, चाय पानी की सुविधा को अमीर के टैक्स से रेखांकित कर देता है। सत्ताधारी को सत्ताच्युत से भिन्न कर देता है और सच को झूठ के झूठे अम्बार से छुपा देता है। और जो खेती इन चुनावों में बोई जाती है उससे कुछ द्वेष, क्रोध, हीनता, ईर्ष्या के कांटेदार पेड़ पौधे गति से बोए जाते हैं और कुछ पल्लवित किए जाते हैं कि प्रेम, आस्था, सद्भाव, समरसता जैसे सूखे मेवे बेचारे पीछे धकेल दिए जाते हैं । यह बात और है कि आर्यावर्त के आर्य, चुनाव समाप्त होते ही अपनी पुरानी धुरी पर लौट आते हैं। जो आपसी सौहार्द भाईचारा और सहिष्णुता के साथ साथ आपसी व्यवहार एवं आपसी व्यवसाय को भी कदाचित पुनर्स्थापित कर देते हैं और नेतागण भी चुनाव समाप्त होते ही अपनी फसल काटने लग पड़ते हैं। जीते नेता भी हारे नेता का कार्य पूर्ण सद्भावना से करते चलते हैं।पूजा के तंत्र में प्रजा की वाणी का अनमोल स्थान है और चुनाव में तंत्र अपनी सहभागिता से आपकी राय अनुसार उत्तम दम स्वस्थ प्रत्याशी का चुनाव स्वस्थ समाज के निर्माण हेतु प्रदर्शित होना चाहिए जिस उद्देश्य इस चुनावी प्रथा को स्थापित किया गया था पुरानी कहावत है खोटा सिक्का खरे सिक्के को चलन से बाहर कर देता है ऐसा ही कुछ इस महासमर चुनाव प्रक्रिया में होता है सुधी निष्ठावान राष्ट्रभक्त नैतिक लोग जब चुनाव हारने लगे और चुनाव तंत्र में बल बंदूक व्यसन पदार्थों का प्रयोग होने लगा उसके बाद तो यह पूरी चुनाव की नदी ही नाले में बदल कर मलिन हो गई. सत्ता एक ऐसी मोहिनी रूपी लालसा है जो दूर खड़े प्रत्याशी को ललचाती तो है ही यदि प्रत्याशी इस सत्ता को पा जाए तो यह लालसा कभी कमजोर नहीं पड़ने देती कि यहां बहुत गंदगी है, बहुत भ्रष्ट आचरण है और इसे समाज की शुचिता के हित के लिए इसे शुद्ध करना है, और या यह कि इस सत्ता के मद को सहन नहीं कर पा रहा हूं तो मैं इसका त्याग कर दूंगा…
चुनाव आते हैं तो राजनीतिक दल जो सत्ता की धुरी होते हैं नम हो जाते हैं नरम हो जाते हैं आम जनता या हितग्राही के पक्ष में विचार करते हैं लुभावने सपने दिखाते हैं और जैसे ही सत्ता प्राप्त हो जाती है तो उन्हीं लुभावने सपने जिन्हें चुनाव घोषणापत्र कहा जाता है, को दूर करने में उन्हें कोई रुचि नहीं रहती. यह मात्र सपनों का पुलिंदा कागज का पुलिंदा बनकर कचरा पेटी को न्योछावर कर दिया जाता है और यह किसी एक राजनीतिक दल का यूएसपी नहीं है कमोबेश सभी राजनीतिक दल एस यूएसपी का पालन करते हैं और सबसे बड़े दुख की बात यह है कि इस सब के मोहिनी स्वरूपास चुनाव का जो लाभार्थी है अर्थात जन समूह वह इस चुनावी गति के तेज बहाव में ऐसा बह जाता है कि उसे समझ ही नहीं आता कि सदैव उसका ही दोहन और शोषण होता है और उसके हाथ पर ले कुछ नहीं पड़ता

क्या चुनाव हमें तोड़ता है या एकजुट होने के लिए अखाड़े की मिट्टी में दंगल कराता है। सवाल कठिन है। उत्तर भी जटिल है। शायद आपके पास सही उत्तर हो।

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