मेरे देश के नाम पाती…
संस्कार की धनी, ज्ञान की धाती, प्रेम की धरोहर और मुक्ति की हामी ये देवभूमि मेरी मातृभूमि,आर्याव्रत कहो या भारत या हिंदुस्तान या इंडिया. . .
भारत बना है मेरी जन्मभूमि,
मेरे पूर्वजन्म के सत्कर्मों से.
भारत बना है मेरी कर्मभूमि,
मेरी निष्ठां औ मेहनत से.
भारत ही बनेगा मेरी मुक्तिभूमि,
मेरे ध्यान औ प्रेम ज्ञान से.
भारत रहेगा देवभूमि इसकी,
वीरता औ विरासत से.
भगवत गीता में कृष्ण उद्बोधन है-
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मन्याततिन्द्रतः
मम वत्र्मानुवार्तानते मनुष्यः पर्थ सर्वथा.
अर्थात, यदि मैं नियत कर्मों को सावधानीपूर्वक न करूँ तो हे पर्थ, यह निश्चित है कि सरे मनुष्य मेरे पथ का ही अनुगमन करेंगे.
गीता में लिखा है-
य एषाम पुरुषं सक्षादात्म प्रभव्मीश्वरम,
न भज्न्त्यवजनान्ति स्थानाद्भ्रश्ता: पतंत्यधः
अर्थात जो मनुष्य अपने जीवनदाता देश/इश्वर की सेवा नहं करता और उसमें शिथिलता बरतता है वह निश्चित रूप से अपनी स्वाभाविक स्थिति से नीचे गिरता है.
क्या हम इस महान देश में नीचे गिर रहे हैं?
क्या हमें आत्मानुशासन करने और अनुशासन सीखने की आवश्यकता है?
क्या हमें नैतिकता व निष्ठा का पाठ पढ़कर भ्रष्ट आचरण को त्यागने की आवश्यकता है ?


क्या हमें एकजुट होने की आशा आवश्यकता है, जब हम एक भारतीय की जाति या वर्ण या धर्म का सदस्य घोषित हो?
क्या हमें जीवन के दोष जैसे लालच, वासना, क्रोध, मद आदि के सबक सीखने की आवश्यकता है. महात्मा गांधी ने भी कहा है
इस पृथ्वी पर सभी जीवो की आवश्यकता हेतु पर्याप्त संसाधन है किंतु किसी एक व्यक्ति के लालच हेतु कुछ भी पर्याप्त नहीं है.
बुद्धा का ध्यान, कृष्ण का प्रेम ज्ञान, पतंजलि का योग और गोरक्षनाथ की भक्ति ही मुक्ति मार्ग के उद्यमी हैं. मानव जीवन रहस्यमयी है और ज्ञान मार्गी भारत देवभूमि में ही रहस्य के मोर्स कोड भाषा को सुलझाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं. विश्व बंधुत्व की परिभाषा हम पर भी उसी प्रकार लागू है जैसे अर्जुन ने कृष्ण से कहा था
दृष्टिमेव स्वजनं अर्थात चारों ओर दोनों पक्ष में मुझे स्वजन ही स्वजन दिखते हैं. स्वजन की प्रेम और आदर की भावना देश के प्रति भी उतनी ही प्रासंगिक है जो जीवन दान के साथ-साथ पोषण भी उपलब्ध कराती है. इसकी सीमाओं की रक्षा के लिए भी भारत के वीर अपना सर्वस्व निछावर कर देते हैं देश की रक्षा में लाखों जवान तैनात हैं और युद्ध काल में जवानों ने जौहर दिखाया भी और जोहर हुए भी परंतु देश तो त्याग की भावना से ही महान बनते हैं. जब जवान / वृद्ध/ छात्र/ स्त्री/ पुरुष/ बच्चे सब एक स्वर से त्याग की भावना से ओतप्रोत हो दो और देशहित में हुंकार भरते हैं, तभी देश महान होने के स्तर से महानतम होकर विश्व गुरु के स्थान पर स्थापित होगा.
ए भारत तुझे अब इस धरती के पुत्र पुत्रियों से मात्र त्याग और अनुशासन की दरकार है. त्याग और अनुशासन के इन्ही दो पहियों के सहारे हमारे विश्व में भारत मेरे देश का परच गुंजायमान रहा है.
परंतु हे देश, तुमसे एक असंतुष्टि भी है, परिवादी है जो तुमने स्थिति को अपनी संस्कृति से पाला पोसा रामायण के राम की 12 कलाओं से नागरिकों को संदेश दिया कि
लक्ष्मण रेखा का पालन करो
त्याग की भावना को पोषित होने दो और
अहंकार के बाहूपास में ना फंसो.
कृष्ण का प्रबंध-ज्ञान भी मिला और बुध का ध्यान-शास्त्र भी किंतु हमारे बीच में पनपी विद्वेष और क्रोध की भावना ने जीवन के नौ रस, 8 भाव और साधन चतुष्टय यानी विवेक वैराग्य संपत्ति और मुमुक्षत्व को कुचल दिया है.
एकमात्र तत्व जो इसे स्थापित कर सकेगा है अनुशासन. अनुशासन एक कड़वी दवाई है किंतु असरदार औषधीय तत्व अनुशासन ही जीवन के मानव को शुद्धता के स्वर्णिम रंग से भर सकता है…
अथः योगः अनुशासनाम. अर्थात, योग ही अनुशासन है और अनुशासन ही योग है. अनुशासन से ही देश का प्राकृतिक स्वास्थ्य है नागरिकों के स्वास्थ्य और हमारी उन्नति का विज्ञान है मेरे देश में आवान करता हूं कि 130 करोड़ भारतवासियों को मुक्ति दे कि….इस सोच से कि
जुगाड़ की नियत से
चलता है कि संस्कृति से
अपने को कौन रोकेगा की आदत से
कानून से बड़े होने से और
भ्रष्ट आचरण से….
आखिर देश या महान देश किससे बनता है जमीन से या जल से. जल्द, हमें सीखना होगा कि हम पालन करें
सत्यं वद धर्मं चर
असतो मा सदगमय
वसुधैव कुटुंबकम
ऋते ज्ञानं न मुक्ति………

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