घुमन्तु हकु के किस्से…
चम्बल नदी के किनारे, भिंड जिले के बीहड़ों में जमींदारों के राजपूत परिवार में हकु का जन्म हुआ था. अंग्रेजों के शासन काल में डाकू इन बीहड़ों की जीवंत साँस हुआ करते थे. शासन, परिवार, शत्रु से विवाद हुआ की ठाकुर साहेब ने हथियार उठाया और कूद पड़े, चम्बल के आगोश में. अन्याय कभी सहन न करने वाली इस कौम में एक विचित्र घुमंतू पैदा हुआ हकुदयाल जो व्यावसायिक बुद्धि का धनी और देशाटन का सदैव हामी. घर से धनी होने से धन, जायदाद, खेती, आध-बटाई से कोई विशेष सरोकार न था. अपना घुमंतू स्वाभाव , व्यापारिक बिद्धि के चलते सूखे मेवे, घी आचार, के छोटे उत्पादों से लेकर घोड़े, गाय , बैल भैस तक का व्यापर कर लेते. उस पर सौदे का भाव ऐसा की जैसा माथा … वैसा तिलक… गरीब को ज्यादा चोट न लगे और धन्ना सेठ से अच्छी वसूली हो जाये. बीहड़ भी ऐसे लोगों से भरा पडा था जिनसे आमजन को कोई हानि न होती थी किन्तु शासन या पुलिस के अत्याचारी या समाज के अधम पापी, सूदखोर बचने न पाते, न्याय होके रहता. धर्मभीरु, शिव उपासक हकु भी उनमे से एक कुलीन होकर भी साधारण व्यक्ति थे. उत्तर भारत और मध्य भारत उनकी व्यावसायिक कर्मभूमि थी. जब आप आगे बढ़ते है तो कारवां बनता जाता है. इसी प्रकार हकु के भी कुछ सेवक, कुछ वनिक बुद्धि साथी ओए कुछ अवसरवादी साथी भी जुड़ते रह्ते यात्राओं में. ये साथी कभी साथ में तो कभी घात में अपना मानवीय रंग भी दिखलाते चलते.
प्रयागराज के पशु मेले से हकु ने इस बार २ बैल जोड़ी और ६ बोरे सूखे मेवे का सौदा कर घर वापसी की तयारी की बैलों पर बोरियां लाद दी गयीं. साधन पैदल ही था और रास्ते कच्चे पक्के गाँवो के बीच से, जंगल के मध्य से, नदी के उथले जल से लगभग तीन सवा तीन सौ किलोमीटर तय करने होते थे. रात में जहाँ धर्मशाला या गाँव की चौपाल या पंचायत का परिसर मिला, डेरा डाल दिया और पुड़ी अचार खाकर रात गुजार ली. ऐसी यात्रा में सबसे ज्यादा खतरा चोरों और पिंडारी से होता था जो उस ज़माने में भी राहगीरों से लूट कर लेते थे.
ऐसी ही एक रात अपने चार साथियों के साथ हकु को जंगले में गुजरना पड़ी. आसन्न खतरा कोई प्रतीत न हुआ फिर भी चारों ने सोने से पहले रात भर की चौकीदारी की पाली बांध ली. हकु सबसे पहले जागेंगे, मध्य रात्रि तक चौकसी देंगे फिर उनका एक व्यापारी साथी एक प्रहार तक और फिर पहला सेवक फिर दूसरा साथी भोर होने तक.
जमीं पर बिस्तर लगे, तीन लोग निंद्रा मग्न हो गए और हकु महाराज लेते लेते चौकीदारी करने लगे. कुछ शंका लगी की कहीं दूर कोई गतिविधि है. हकु टोह लेते रहे, शंका कुलबुलाती रही और उनकी निंद्रा का समय भी आ गया. उन्होंने अपने व्यापारी साथी को उठाया और कहा कि ……भाई अब मेरी बारी हो गयी आप जागो चौकस रहना कोई गतिविधि महसूस हो रही है अँधेरे में दीखता अलग नहीं है.
…….वणिक बुद्धि, निंद्रा रानी के नशे में उठे , बैठे फिर उनींदे हो, टेढ़े मेढे हो निंद्रा आगोश में फिर चले गए. दिनभर पैदल चले हो तो रात में निन्द्ररानी आपको अपने से अलग होने नहीं देती है.उधर शंका कुशंका के चलते हकु को नींद न आई या आने न दी. आँखे खोले देखते रहे की एक साया दिखाई ही पड़ गया. अब नींद अलग भाग गयी, हकु ने अपनी दुनाली बन्दुक सहला ली और पकड़ मजबूत कर ली. शांत पड़े रहे हकु, लगा जैसे एक या दो ही है चोर तो हकु की हिम्मत बंध गयी. ये संख्या तो काबू में किये जाने योग्य है. करने दो इनको शैतानी देखें करते क्या है ये चोर. सोच हकु राजा सन्न पड़े रहे…
चोर एक रस्सी से सूखे मेवे की मन भर वजनी बोरी बाँधने की कोशिश कर उठा….जो जाग के सो गए व्यापारी के पैरों के पास ही रखी थीं. हकु अधखुली आँख से तमाशा देखते रहे जैसे ही चोर ने बोरी में रस्सी बांध पीठ पलटी और सामने के गड्ढे में अपनी जगह बनायी, की रस्सी बंधी बोरी खेंच लूँ, हकु ने रस्सी बोरी से खोल, सोये हुए साथी व्यापारी के पैरों में कस दी.
अब हकु निश्चिन्त हो गए कि अब न चोरी हो पायेगी और बाकि लोग भी निष्ठां से चौकीदारी कर सकेंगे.
लगभग आधा घंटा सन्नाटा रहा. चोर भी इस धोखे में सुस्ता लिए कि बस अब बोरी खींचने ही का कार्य बचा है. जो इस गड्ढे में खड़े होकर १० हाथ की दुरी से ही कर लेंगे.
अब चोर टोली ने हाथ लगा मन भर की बोरी समझ जोर से खींचा तो साथी या चोर समझ पाते वे सोते सोते खिंच गए नीचे की ओर …और सीधे गड्ढे में जा धंसे चोरों के उपर. चिल्ला चोट हो गयी, हो हल्ला हो गया, बैल गले की घंटी बजा के खड़े हो गए, चोर टोली भाग खड़ी हुई सेवक, हकु, साथी सब उठ बैठे, कूहर हो गया.
लगे चिल्लाने, ये रस्सी मेरे पैरों में किसने बाँधी? हकु ठठाकर हंस दिए.
चौकसी के समय नींद लोगे तो यही होगा. चोरो ने तो मेवे की बोरी बाँधी थी मैंने पूरा बोरा ही बांध दिया और बांधते में भी तुम्हारी नींद न खुली. सेवक गण भी मुंह दबा के हंस दिए. वंही साथी कभी गढ्ढा देखते, कभी धोती कपडे तो कभी खुद को. फिर धीरे से खिसिया दिए. थके बहुत थे इसलिए नींद न छूती अब तुम लोग सो लो मैं पहरे पर हूँ. चोरे भाग गए, अब सब सुरक्षित है जान, हकु के खुर्राटे जंगल में गूंज उठे.
बारिश के चौमासे उसे समय यात्रा के लिए सुविधाजनक न होते थे. न छत, न जमीन, सुखी रहती, नदी नाले उफान पर चहुँ और पानी ही पानी….. तो हकु का ये विश्राम काल होता जब वे घर रहकर सुस्ता लेते.
चौमासे के बाद व्यापर और घुमने हेतु किस दिशा जायें ये बराबर वार्तालाप का विषय पूरी दोपहरी बना रहता, घर की बारादरी में सायबान के नीचे, चाय की चुस्की के साथ. चार धाम , अष्ट विनायक, १२ ज्योतिर्लिंग, गंगासागर जैसे तीर्थ स्थलों की चर्चा निरंतर होती. पहाड़ों पर जाने का आनंद भी अलग है, जो हो आये हैं, उनके किस्से चलते रहते फसलें पकती रहतीं , बारिश की बूंदें गिरती रहतीं और योजानाये बनती रहती.
एक दिन बचपन के एक मित्र आ गए और अपने स्वभाव के विपरीत दिन भर बैठे रहे , बतियाते रहे, हकु के किस्से सुनते रहे अपने सुनाते रहे. शाम होते होते मित्र जाने का उपक्रम किये तो हकु सायबान से निकल, बाहर सड़क तक आ गए.
बोल उठे हकु, मित्र से, कुछ काम था क्या?
हाँ भैया, कुछ मदद चाहिए थी .
काहे की.
पैसे की.
कितने.
रुपये २०००० की, एक खेत खरीदना चाह रहे थे.
भाई, पैसे हम तुम्हें न दे पाएंगे….बिना लाग लपेट बोल गए हकु अपने मित्र् से.
मित्र की आस का मुंह लटक गए . पूछ बैठे क्यों… ऐसी क्या नाराजी है!
मित्र. हम तुम्हारी मदद इसलिय न कर पाएंगे क्योंकि हम अपने पैसे तुमसे वापस न मांग पाएंगे.
सन्न रह गए मित्र.
सन्नाटा गहरा गया, मित्रों के बीच.
हकु राजा की चतुराई ने पैसे और दोस्ती दोनों को दागदार होने से बचा लिया.
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गर्मी की लू लपट के बीच अकेले एक सेवक के साथ यात्रा करते, भरी दोपहर एक आमराई के नीचे, गाँव किनारे कुछ घोड़े और व्यापारी देखे , सोचा गर्मी की दोपहर आम के पेड़ों के नीचे बिता ली जाये. सेवक को इशारा किया, डेरा डल गया एक कोने पर.कुछ रोटी सिंक रहीं थीं, हकु ने भी सेवक को बोल दिया कुएं से पानी ला तैयारी कर लो दोपहर यहीं रुकेंगे. और खुद निकट स्थित गाँव के घरों की और बढ़ गए.
देखा कुआँ है बाल्टी है रस्सी है, पानी निकल कर पिया फिर देखा की सामने ही एक धनी व्यक्ति का घर है. घर के धनी होने की पहचान दरवाजे की लकड़ी, उस पर नक्कासी के साथ रंगों के साथ आसानी से की जा सकती है. सो हकु आगे बढे और बजा दी सांकल, दरवाजे की. एक जवान स्त्री ने दरवाजा ओत से थोडा सा खोला की हकु बोले, यात्री है…रोटी बन रही है वहां सामने आमराइ में, कुछ अचार सब्जी मिल जाएगी क्या?
…..कोई अचार विचार नहीं मिलेगा, भिखारी जैसे चले आते हो!
स्त्री की तल्ख़ आवाज गूंज उठी…
लाल हो गए हकु, बोल ही दिए, धीरे से ……अभी खसम ने अचार माँगा होता तो न जाने क्या क्या दे देतीं.
और चले आये हकु….
बोल तो दिया हकू ने, परदेश में पड़े हों और तेज आवाज़ में ऊँचे बोल कहना, उचित नहीं है. तिरछी निगाह से देखते रहे हकु, दरवाजे को, कोई संकट तो न आ जायेगा.
तभी घर के मालिक, कद्दावर पहलवान की भांति दरवाजे की सांकल बजाते दिखे….दरवाजा खुलते ही स्त्री ने किस्सा कह सुनाया…बातचीत करते करते….. स्त्री भीतर चली गयी और एक थाली और लट्ठ लेकर पहलवान जी को देकर दरवाजे में ओझल हो गयी.
पद्दिया पर बैठ गए पहलवान जी, चिल्ला दिया एकदम से..
हाँ, भैया, आ जाओ किसको चाहिय था अचार?
हकु ने चुप्पी साध ले, सेवक को काम करते रहने का कह दिया. और स्वयं तमाशा देखने की तयारी करने लगे जो खुद ने ही खडा किया था.
आमरे के नीचे बैठे कई लोगों ने लपककर घर की और रुख कर लिया, हाँ , दद्दा हमें दे दो अचार.
कौन आया था अचार मांगने.
हाँ हाँ, दद्दा हमीं आये थे …..एक अधेड़ घुमंतू व्यपारी ने हाथ जोड़ दिए.
इतना होना हुआ की पहलवान जी ने अधेड़ का गला पकड़ लिया , दे गाली गलौच, एक हाथ में डंडा लहराता जाता और दुसरे हाथ में व्यापारी की गर्दन. तमाशा बन गया, भर दोपहरी. भोजन बनना थम गया. मार पीट की नौबत आ गयी अचार तो दूर हुआ, गाली, लांछन और कुटाई से पाला पड गया. ठिठक गए सब, पैर पीछे मुड गए, अधेड़ व्यापारी को समझ न आया, कि …..ये बवंडर क्या हुआ. गरियाव होता रहा, कोई समझ् न पावे की मुद्दा कैसे सुलझे.
हकु चुपचाप अपने सेवक के साथ दूर बैठे तमाशा देखते रहे.
हर क्रोध, जोश की समय सीमा होती है, जैसे ही पहलवान का स्वर धीमा पड़ा….. हकु उठ खड़े हुए और लपक लिए सुलह कराने को, पञ्च परमेश्वर की भांति.
…..दद्दा , हो गयी होगी बच्चन से गलती, छमा कर देयो ……. अब धीर धरो…… भूखे होएंगे ……तासो कह दी होइगी . नादान हैं थके भये होएंगे, तासो मांग लियो होयगो.
………आवाज, बोली, लय सब बदल लिया हकु ने कि कहीं घर की स्त्री न पहचान ले कि, ……यही था बदमाश.
पहलवान भी शांत हो गया, डंडा अभी भी हाथ में था. हकु की पञ्च पंचायत में बाकि सबने माफ़ी मांग ली और हकु ने सबको आमरे में जाने को कह दिया और खुद पुरखा बन बतियाने लग पड़े पहलवान से.
थोड़ी देर बाद ही लोगों ने देखा हकु, अचार की थाली लिए चले आ रहे हैं, रोटी तैयार थीं, भोजन स्वादिष्ट हो चुका था.
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सर्दी का मौसम, सर्द चलती हवाएं और चम्बल नदी का किनारा ….हवा ऎसी लगती जैसे शूल. हकु के साथ ६ लोगों का झुण्ड, शाम का धुंधलका गहराने लगा, गोधुली बेला जान, जो गाँव पहले पड़ेगा अब, किसी मकान या दीवार की ओत से पेड़ नीचे ठहर जायेंगे निश्चित हुआ. एक साथी बोल उठा, आते गाँव के जमींदार ठाकुर मेरे जीजा जी के मित्र है उनके घर रुक सकते है, यह सुनते ही हकु की आँखें चमक उठीं. बोले, क्या क्या जानते हो उनके बारे में बताओ तो पहले से अच्छी भूमिका बना लेंगे तो सेवा सत्कार अच्छी हो सकती है. जानकारी जो उपलब्ध थी साझा की गई. हकु ने अपनी पोटली से पगड़ी निकाली, आँखों में काजल लगाया और चल पड़े, बोला कोई हकु दादा पुरे वैद्यराज लग रहे हैं…. तो यही बोल देना हमारे साथ बैध्यराज भी है जो कम बोलते हैं. तय हुआ और गाँव आ गया.
जीजा जी के मित्र जमींदार ठाकुर के निवास पर परिचय हुआ. मुंह हाथ धोते धोते चाय आ गयी. जमींदार भी पगड़ी बांधे वैद्यराज हकु को देख प्रभावित हुए. निवेदन कर बैठे कि आज रात यहीं रुकें आप सब लोग हमारे मेहमान होंगे, भोजन प्रसादी यहीं होगा.आधे घंटे में मंदिर में आरती होगी पश्चात् भोजन होगा.
सभी आगंतुक प्रसन्नचित्त हो गए कि भोजन, बिस्तर और छत के नीचे इस सर्द मौसम में चैन की नींद की व्यवस्था हो गयी और वह भी निशुल्क. इस देवभूमि की यह पारंपरिक धरोहर रही है की अतिथि को देव तुल्य सम्मान मिलता रहा है और अनजान यात्री को भी सम्मान के साथ चाय पानी, गुड चना या सत्तू जैसे उर्जावान भोजन गाँव के छोटे किसान के यहाँ भी उपलब्ध हो जाता था. ये तो अब आधिनिकता और अराजकता के फैलने से लोगो में आपसी भरोसा कम हो गया अन्यथा भारतवंशी एक दुसरे की मदद को इश्वर का कार्य जान संपन्न करते थे.ग्रामीण भारत की भी सदैव से यह अलिखित व्यवस्था रही की भूखे को भोजन और सोने का बिछौना भी मिल जाता था. अब ठगी के इस परिष्कृत दौर में लोग शहरी हो या ग्रामीण, पहाड़ी हो या मैदानी…आपसी विश्वास खो बैठे है, और दरवाजे पर पले कुत्ते आगंतुक का स्वागत ही दन्त दिखा कर करते है. तो ये चाहे या अनचाहे मेहमान दांत निपोरते बाहर से ही बाहर निकल जाते हैं.
मंदिर में आरती संपन्न हुई , भोजन प्रसादी में पूरी साग मीठा सब परोसा गया, भर पेट भोजन पाया गया…… कि वैद्यराज के मुसीबत आन पड़ी.
जमींदार अपने ७ साल के बच्चे को ले आ बैठे और बताने लगे, पंडित जी महाराज , ये बच्चा एक दिन खेलते खेलते गिर गया और एक तरफ से इसकी गर्दन टेढ़ी हो गयी है, इलाज कराया, दवाई लेप , मालिश, इंजेक्शन सब कराया किन्तु ये गर्दन ३ महीने से सीधी ही नहीं हो रही है.
बस, बायीं और इस बच्चे का सर घुमा ही रहता है सीधा नहीं हो पा रहा है.
वैद्यराज हकु तो लटपटा गए एकदम …माथे से पसीना चुचुआ आया…लगा ह्रदय की धड़कन सीधे मस्तिष्क तक ढोल बजाने लगी…..धड धड धड…ह्रदय अब मुंह को आया या तब आया.
खड़े हो वैद्यराज ने बच्चे को देखा, दायीं और खड़े हो गर्दन देखि फिर बायीं और खड़े हो गर्दन देखि जैसे कोई पुराना घाघ , सौदे के पहले घोड़ी के दांत गिनता है और गर्दन सहलाता है.
सुबह करूँगा उपचार….कह हकु कमरे से बाहर आ गए. देखा दालान के कोने पर नीम का बड़ा दरख़्त है जहाँ नौकरों ने अलाव जला रखा है जो ठण्ड के इस मौसम में सभी को गर्माहट से सराबोर रखता है.बैठ गए वैद्यराज अलाव के सामने ईंट की आसनी बना कर . देखा जो साथियों ने , तो वे भी हकु के आसपास अलाव के चारों और आ बैठे. धीरे धीर सेवक गण उठने लगे, और अलाव मेहमान आगंतुकों से आलोकित हो गया. भावहीन, विचार शून्य, असान्न संकट से संशंकित, कि भोर होते ही क्या होगा. हकु के माथे की लकीरें चिंता से और गहरा गयीं जब देखा कि वह बीमार बच्चा भी अलाव के पास आ टेढ़ी गर्दन ले बैठा. निपट सन्नाटा, अब क्या होगा, का भाव अंतर्मन में…अलाव कुरेदते, लकड़ी डालते, जलने को आग पलटते धीमे धीमे बात करते, झुण्ड के साथी , अब आगे क्या होगा. अब क्या होई? समय बड़ा विचित्र है! मुसीबत हमेशा से आगे है. जितने मुंह उतनी बातें, समस्या एक बच्चे की एक तरफ को झुकी गर्दन और एक नकली वैद्यराज. प्रश्न विकट अब क्या होगा? अब क्या होगा? घडी आध घडी बीतने को आई, सवाल घुमड़ घुमड़ आ रहा…. अब क्या होगा. दिन भर चले होने के बाद भी नींद आँखों में नहीं.
वैद्यराज अलाव की आग लकड़ी के बड़े टुकड़े से कुरेदते, परेशां कि….किन्कर्व्यविमूढ़ .
कि हकु ने लकड़ी का मशाल नुमा अग्नि पुंज उठाया और अपने सामने बैठे , दूसरी और तकते बच्चे आँखों के सामने, जलती मशाल तेजी से लहरा दी,
“अब यह बच्चा जो चाहेगा वही होगा”….. जोर से गुर्रा दिए हकु सरदार….
….जैसे ही बच्चा डरा, चमत्कार हुआ, बच्चे ने डर के मारे गर्दन दायीं और घुमा दी और सर सीधा हो गया.
जैसे बिल्ली के भाग्य से मख्खन से भरा छींका टूट जाता है बच्चा रोगमुक्त, गर्दन घूम गयी, सर सीधा और वैद्यराज स्थापित.
हो हल्ला हो गया ….छोटे राजा ठीक हो गए, नौकर दौड़ गए , हकु को गोद में उठा लिया साथियों ने . हकु ने नीचे उतरने का संकेत किया बोले चुप रहिये सब….. सुबह की पहली किरण के साथ यहाँ से निकलना है .
जमींदार कपडे लपेटते लपकते रनिवास से चले आये, बच्चे को आलिंगन में ले लिया, गर्दन देखि सर देखा, हकु वैद्यराज पंडित जी की कृतज्ञता से देखा, सर नमन किया, आँखों में आंसू लहरा आये.
पौ फटते ही हकु और साथी दान दक्षिणा के साथ रवाना हो गये ….इससे पहले कि गाँव में ख्याति फैले कि बड़े वैद्यराज ने जमिन्दार के बेटे को रोगमुक्त कर दिया , हकु अपने मूल स्वरुप लिए गाँव से बाहर. झूठ की खेती ज्यादा देर नहीं फलती… समय रहते मौलिक होने में ही श्रेष्ठता है.

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