विदुषी सुमन….

नवजात पुष्प

एक विदुषी महिला.

पांडित्य में पारंगत.

एम ए हिंदी फिर एम ए संस्कृत.

प्राध्यपिका, प्रभु जी की भक्तिन,

अनुशासन से भरपूर,

सम्मानीय व्यक्तित्व..

लेकिन अति कर्मकांडी.

प्रातः ५ बजे उठ, नित्यकर्मो से निपट, प्रथम कर्म बगीचे में आ जाना. सुबह का पैदल चलन और ….और बगीचे के नवजात पुष्पों को तोड़कर अपनी टोकरी में स्थान देना. जितने पुष्प पैदा हों उतने उस टोकरी में स्थान पा जायें. निर्मम रूप से ये नवजात मात्र संस्था से विलग किये गए, उनकी पौध माँ के कष्ट या पौध माँ से पुष्प पल्लवित होने हेतू पोषित होने की अनिवार्यता को भी त्यागते हुए यह टोकनी रंग बिरंगे, सुगन्धित पुष्पों से प्रचुर हो जाती.

प्रतिदिन का क्रम.

विदुषी का मंत्रोचार भी चरम पर होता जब पुष्प चुने जाते. कुछ क्षणों बाद तुलसी दल खोंट लिए जाते, प्रभुजी को समर्पित किये जाने हेतु. पुष्प दल या तुलसी दल की कोई सीमा नहीं. जितने नए पुष्प बगीचे खिले हो और जहाँ तक विदुषी के हाथ ये पराक्रम करने पहुँचते हों, चुनने का कार्यक्रम जारी रहता.

सारे पुष्प और तुलसी दल, प्रभुजी के श्री चरणों में स्थान पा जाते . कुछ कुलीन पुष्प, प्रभुजी के शीर्ष तक पहुँच जाते और शोभायमान हो विदुषी को हर्ष से भर देते.

घंटे २ घंटे बाद सभी पुष्प दल, निष्ठुर प्रयास के वशीभुत अपनी उर्जा, गंध, रंग सब खो देते. प्रभूजी भी सोचते होंगे कि, मैंने किस लिए इन पुष्प दलों और तुलसी दल को पैदा किया और ये देव अर्पण को समर्पित हो गए. कतिपय कीट पतंगों, भौंरे चिड़ियों का भोजन होते, परागण कर बीज का स्त्रोत होते, संतति निरंतरता के है ये पुष्प, मातृशक्ति से अलग हो, विदुषी के हाथों श्री चरणों में नष्ट हो गए.

एक दिन सोच लिया मैं….

दीदी,

मुड़कर देखा उन्होंने, आँखों में आश्चर्य था किन्तु जुबान पर कोई कथन नहीं. आगे बढती गयीं, मंत्रोच्चार के साथ पुष्प चुनते चुनते.

बहिन जी सुनिए!

आंटी जी !

तब वे ठिठकी.

हाथ और मस्तिष्क दोनों स्थिर हो गए. प्रति उतर फिर भी कुछ नहीं.

मैं बोल ही पड़ा,

जी इतने पुष्पों का क्या करती हैं…

पूजा में काम आते हैं…

सपाट उत्तर.

इससे आपका मन अच्छा हो जाता होगा.

वे विस्मयादिबोधक भाव देने से चुकी नहीं.

मैं भी जारी रहा..

दीदी …..पुष्प के पर्यायवाची क्या होते है?

जैसे बम गिरा!

ऐसे प्रश्न की प्राध्यापिका महोदया को आशा न थी. बोल गयीं फिर भी….

सुमन…

……तो सुमन अर्पित कीजिये न श्री चरणों में.

मेरे ये वाक्य सुनते ही उनके मनः पटल पर एक विचित्र भाव आ गया. ये क्या बात हुई भला. मैं शांत रहा. और तुरंत मुड गया, अपने गंतव्य को, न रुका बगीचे में.

दिन बीत गया. मन उद्वेलित बना रहा, मेरा, विदुषी को विचार र्श्रन्ख्ला में लाते – छोड़ते.

अगले दिन सुबह बगीचे में कम पैदल यात्री थे. मैं नित्य कर्म हेतु पैदल यात्रालीन हो गया. अचानक सामने से विदुषी आ गयीं. यंत्रवत नमस्कार को हाथ जुड़ गए. कोई संवाद नहीं .

किन्तु आज उनके हाथों में फूल चुनने को कोई टोकरी न थी.

May Flower

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