राजा भोजपाल परमार –

लोकप्रिय राजा, सदा प्रजा के लिए।

ये कथानक राजा भोज का है जो परमार वंश के 7वीं शताब्दी दौरान मध्य भारत के शासक थे। राजा भोज का नाम बड़े सम्मान के साथ उनकी न्यायप्रियता, नागरिको की समग्र सेवा ओर सदाशयता के लिए लिया जाता है। आज का भोपाल पूर्व में उनके नाम भोजपाल पर ही स्थापित हुआ है।

किस्सा यूँ है कि एक बार राज्य में अकाल पड़ा। राजा ने मदद पहुंचाई। 4 गरीब किसान प्रसन्न होकर राजा के दरबार में कविता सुनने का मन बना लेते हैं। एक दिन खेत में रेंहट के पास बैठे बैठे उन्होंने सोचा, अपने राजा कलाप्रिय है पारखी है उनके लिए कुछ कह दिया जाए।

एक किसान बोला,

*भनन भनन रहँटा भन्नाय*

अर्थात कुएं से पानी निकालने वाला रंहट भनन भनन की आवाज करता है।

तो दूसरा बोल उठा,

*तेली का बध खली भुस खाये*

याने तेल निकालने वाले तेली का जो बैल है उसे भूसे के साथ तेल युक्त खली भी मिलती है।

तीसरे ने भी दिमाग लगाया और एक शिकारी को जाते  देखकर बोल ही दिया,

*तीर चलंते तरकश बन्द*

अब चौथे की बारी पर उसे कुछ सुझा नहीं तो गुस्से में उसने बोल दिया,

*भोजराज हैं मूसरचंद*।

याने राजा भोज हैं मुरखराज।

बाकी तीनो किसान बिफर गए, बोले ये अपने को फांसी पर लटकवा देगा। इसे सही करो।

अंत में सहमति से चौथी लाइन बनी

*भोजराज हैं पूनो के चाँद*.

इस प्रकार कवित्त पूर्ण हुआ और महल की ओर यात्रा प्रारंभ हुई।

दरबार में प्रस्तुति हुई कि दूर गांव से कुछ किसान अन्नदाता अपनी बात कहना चाहते हैं।

राजा भोज ने बुलवा भेजा। किसानों ने प्रणाम किया और कहा कि हम गरीब किसान आपकी सेवा में कुछ कहना चाहते हैं-

पहले किसान ने जोर से पहली पंक्ति कही की,

*भनन भनन रहटा भन्नाय*

इतना सुनते ही राजदरबारी जोर जोर से हसने लगे। राजा ने गंभीरता लेते हुए से इस वाक्य का मर्म राजपुरोहित को समझाने हेतु कहा।

राजपुरोहित समझ गए और बोले……. ये जीवन का बड़ा ज्ञान से परिपूर्ण वाक्य है जिसका अर्थ है कि, जीवन की धुरी सूर्य चंद ओर पृथ्वी के घूमने से चला करती है जो नियमबद्ध है जिसके चारों ओर हम सभी का जीवन चलता है।

राजा प्रसन्न हुए और इन्होंने 100 स्वर्ण मुद्रा का पुरस्कार पहले किसान को देने का आदेश दिया।

दूसरे किसान ने कहा,

*तेली का बध खाली भैस खाये*

दरबार फिर अट्टहास में डूब गया। राजा भोज ने फिर राजपुरोहित को व्याख्या करने को कहा। राजपुरोहित बोले ……..ये उक्ति मानव जीवन में मेहनत के महात्म्य को समझाती है कि जो जीव मेहनत करेगा उसे जीवन के समस्त सुख प्राप्त होंगे जैसे तेली के बैल को वनस्पति की वसा युक्त भोजन नियमित रूप से मिलता है।

राजा भोज ने प्रसन्न होकर 100 स्वर्ण मुद्रा का पारितोषिक इस किसान को भी देने का आदेश दिया।

अब तीसरे किसान की बारी थी…

*तीर चलंते तरकश बन्द*

दरबार में अब सन्नाटा था कि ये गहन चर्चा का विषय है। राजपुरोहित ने इस पंक्ति का मर्म समझाया कि…..जीवन में कैसा भी पराक्रम , साहस, वीरता से लड़ लो , जी लो, कमा लो, एकत्र कर लो…..परमात्मा की ओर वापसी यात्रा में आपके तरकश में कुछ नहीं बचता ओर साथ में कुछ नहीं जाता है।

राजा अति प्रसन्न हुए और इस किसान को भी 100 स्वर्ण मुद्रा मिलीं।

अब चौथे की बारी आई,

भोजराज हैं पूनों के चाँद।

दरबार तालियों से गूंज उठा। परंतु राजा भोज प्रसन्न नहीं हुए। कहा, है अन्नदाता किसान ये चाटुकारिता मुझे भाई नहीं। तो किसान बोला कि महाराज क्षमा चाहता हूं मेरी पंक्ति तो भिन्न थी, मेरे साथी मित्रो के कारण इसमें मैने परिवर्तन किया है।

राजा बोले वो सुनाओ।

चौथा किसान बोला,

क्षमा महाराज,

भोजराज हैं मूसरचंद।

इतना सुनते ही दरबात में सन्नाटा पसर गया, सेनापति ने तलवार खींच ली, तभी राजा भोज ठठाकर हंस पड़े।

बोले बात तो तुमने एकदम सही कही किसान भाई. इस नश्वर जीवन में माया के आगोश में हम सब मुसरचंद ही हैं. इस किसान को 1000 स्वर्ण मुद्रा का पुरस्कार दिया जाए।

ऐसे थे राजा भोज जिन का शासन आज के बड़ोदा से भोपाल-विदिशा तक फैला हुआ था।

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