मेरा पहला प्यार….
वो जब मेरे जीवन में आई तो मैं छोटा ही था किंतु वह अति सुंदर, कुलीन ओर विदुषी महिला दिखती थी। मेरा मन उसे देखते ही आ गया उस पर, भर आया मन, कि प्रकृति की कितनी अनमोल सुकृति है यह षोडशी। वह मुझे अपने आगोश में जब लेती तो गर्माहट का वह एहसास मुझे होता कि मैं उसे शब्दों में आवाज ही न दे पाता। निःशब्द और कुंद, भावनाओं से अतिरेक, मेरी मानस पटल पर वह ऐसे छा जाती जैसे प्यासी धरती पर जल भरे बादल घुमड़ जाते हैं बरस जाते हैं। जब मैं उसके हाथों में ओर उसके सीने से चिपका होता तो लगता जैसे में उसका ही हिस्सा हूं। हमारे साथ ओर प्रेम की बेल फैलने लगी बढ़ने लगी और मैं भी बढ़ने लगा। ये दुर्गा स्वरूप मुझे अपनी आंखों से ओझल न होने देती….. जब देखो तब अपने सीने से चिपक लेती जैसे सीप में कोई मोती चिपका होता है। सभी ओर से सुरक्षित, सारगर्भित ओर पूर्णता के अहसास से भरपूर। दिन गुजरते रहे, समय का चांद सूरज के साथ ग्रहण और पूर्णिमा का चक्र को पूरा करता गया और मैं इस शक्ति के आगोश में बढ़ता गया, प्यार के नए परवान चढ़ता गया। जब भी मैं शरारती होता उसकी क्रोध भारी आंखे मुझे भय से भर देती…… कहीं में उसे खो न दुँ।
….और यह यौवना मेरे गालों को धीरे से थपका देती और मैं लाल सुर्ख हो जाता जैसे उसके गोरे रंग को मैंने अपने श्याम वर्ण में रंग लिया हो। मेरा प्यार बढ़ता गया, उसका प्यार शुरू से एक जैसा *तू नहीं सुधरेगा* की धारा पर चढ़ता गया।
में आगे बढ़ता गया, जब तक कि दूसरी स्त्री मेरे जीवन में नहीं आ गई।इस दूसरी का भी मेरी पहली ने स्वागत किया और मेरे सर पर हाथ रख कर फिर कहा, *तू नहीं सुधरेगा*।
मैं जीवन की इस दूसरी में इस खोया की मेरी *तू नहीं सुधरेगा* मार्का को मैं भूलने लगा । जब भी मैं उसे मिलता वह पुराने दिन याद कर मुझे सीने से लगा लेती, आंख में पानी भर लेती, गला रुंध जाता उसका लेकिन कहती कुछ नहीं। कहती तो बस इतना, *तू नहीं सुधरेगा*। मैं कुछ कह नहीं पाता।
मेरा पहला प्यार, पुरातन प्यार, प्यारा प्यार अब ढलने ओर ठहरने लगा है और मेरा उत्साह दूसरी स्त्री के प्यार में बहने लगा है। सच ही कहा उसने, तू नहीं सुधरेगा!
मानव स्वभाव की चारित्रिक कमजोरी उसे एक से दूसरी स्त्री की ओर धकेल देती है चाहे वह पहला प्यार जो माँ का *तू नही सुधरेगा* ब्रांड वाला हो या दूसरा प्यार जो हॉर्मोन की उत्तेजना से आल्हादित भौतिक ओर शारीरिक प्यार हो।
इस दूसरे प्यार की संवेदना की परिणीति तीसरे प्यार में तब हुई जब मेरी बेटी मेरे हाथों में आई। मुझे लगा क्या ये मेरे पहले प्यार की पुनरावृत्ति है या यह नया है कुछ, जहां मैं एक एकदम ही नई भूमिका में हूं जो इस नन्ही सी कली को मेरा संरक्षत्व प्रदान करेगी।
मेरा पहला प्यार तब परवान चढ़ा जब मैं मेरी मां के गर्भ में 9 माह रहा। और दूसरा प्यार मिलने तक वह पहला नारीत्व प्यार मुझे थपकाता रहा, दुलारता रहा, सिखाता रहा और कहता रहा कि *तू नहीं सुधरेगा*।
जब मेरा तीसरा प्यार, मेरे दूसरे प्यार के गर्भ में आया तब मुझे पुनः यह शक्ति दृष्टा अनुभूति हुई कि मैं पुनः जन्म लेने के आनंदित क्षणों में हुं।
प्यार की अनमोल भेंट स्त्री स्वरूप ही है जो नारी के अतिविशिष्ट चरित्र का परिचायक भी है जो पहला हो, दूसरा हो या तीसरा हो, पुरूष को प्यार से हरा भरा कर देती है, प्यार से पहचान कराती है, प्यार से भर देती है फिर चाहे वह *तू नही सुधरेगा* वाली मां हो या हॉर्मोन चलित प्रेयसी हो या आप का अंश पुत्री हो। प्रकृति की यह अनमोल अनुकृति नारी, मां, प्रेयसी और पुत्री के रूप में पुरूष के जीवन को अनादिकाल से समृद्ध करती आई है।
यथा प्रणामम

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