माया लीला
स्त्री माया है तो पुरुषत्व भी
माया संसार तो जीवन तत्व भी
माया भजनी है या तजनी है
कोई समझे ये तो बस बहनी है.
बहाव जो रोके तो भ्रम से रहें
कोई रमता गया तो कोई लीला में बहे
माया उत्तर नहीं, जो है पर कतई नहीं
माया प्रश्न नहीं, किंचित वास्तविक नही
लीलाधर की लीला है जान लो तो पारलौकिक
जो माया से उलझे तो बोलो ये अलौकिक
माया है महा ठगनी, धन रूप से भरमाती
काल खंड की रूपिणी जन जन को लुभाती
स्त्री पाने को दौड़ें पुरुषत्व से इतराती
लावण्य बैर मित्र जाने क्या क्या कराती
मनोहारी माया स्वतंत्र माया देहधरे को करें परतंत्र
माया सदा मिथ्या,दर्पण में दृश्य दिखे सत्या. माया सुंदर भोग में आसक्त,
जो विवेकी तुम तो भोग से विरक्त
ग्राह्य क्या त्याज्य समझते जीवन बीते
दर्पण न देखें तो वापसी में हाथ रीते.
माया कैसे बने मोक्ष, सुख दुख अनित्य
मृत्यु बने कर्मफल प्रकृति लीला नित्य
माया मेरा है अहंकार या यम का द्वार,
है माया, परंतु नहीं, आभास का व्यवहार.
Leave a comment