मानव मन मलिन ! ! !
प्रकृति की आत्म कथा.
हे मानव…..
जो तुम बैठो पास मेरे,
हथेली से मेरी घास सहलाओ.
और देखो पौधे की पत्तियां,
कोई भी एक जैसी कतई नहीं. 1
देखो तुम कलि पुष्प मेरे,
किस उत्साह से फूलते महकते.
हवा में लहराते झूमते,
निकट है अंत, फिर भी रहते मुस्कुराते 2
देखो कभी नाचते पेड़ को,
हवा में मस्ती से लहराते झूमते.
उनको घूमना मना है,
फिर भी जड़ों से नहीं अघियाते. 3
देखो कभी पतझड़ मेरा,
मित्र- पत्र सब साथ छोड़ जाते.
मेरे उदास मन को देख,
नए पत्र आते और फिर हर्षाते. 4
देखो मेरी लीला बीजों की,
संतति बढ़ने को फल लगाते.
मीठे, खट्टे, रसीले और नशीले,
अद्भुत लीला, कभी न तुम कहते. 5
अद्रश्य प्राणवायु को तुम भूले,
कभी न तुम धन्य भाव जगाते.
और पूजा को पुष्प तोड़,
मुझको तुम अति दुखियाते. 6
हमें बर्बाद होते देखते तुम,
न जाने क्यों, विरोध न दिखाते.
सोचा तुमने मंदिर में प्रभु विराजे,
माना नहीं, प्रकृति में प्रभु विराजते. 7
नदी, पहाड़ जंगल धरोहर,
मित्र, समझ न तुम मुझे सहेजते
धरा तुम्हारी संपत्ति नहीं,
कुछ पल के मेहमां तुम, नहीं समझते. 8
बुद्धि-उर्जा के तुम कैसे धनी,
अर्जन करने का ही धर्म पढ़े होगे.
सूर्य के ऋणी, जल के कृतघ्न,
अनुग्रहित हो, क्या तुम कभी समझोगे ? 9
शिकायत करते हम तुमसे हर बार,
जैसे तुम्हें वैसे ही हमें जीने का अधिकार.
संग जीने की अब तो समय की मांग,
अब तो सुनो हमारी ये दर्द भरी पुकार 10

शून्यता भली, गिनती से
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