बादाम सिंह
ये किसका एक्स रे है?
….मेरा है.
अच्छा , आप हैं बादाम सिंह. क्या करते है?
….पहलवान हूँ.
वह तो दिख रहा है!
….क्या मतलब डॉक्टर साब!
अरे, दोनों फेफड़े खराब हो रहे हैं.
….हाँ, साब २ महीने से बीमार हैं, भरती कर लीजिये.
नहीं दवा खाइए, आराम कीजिये, अभी अस्पताल में भरती की आवश्कता नहीं है, दवाई से आराम हो जायेगा.
…..नहीं होगा डॉक्टर साब, मेरे को भरती कर लीजिये.
क्यों , क्या बात है.
…मौन !
बोलो दादा, क्या बात है.
…मौन !
आपकी उम्र ६७ है, पहलवानी खूब की आपने?
….जी डॉक्टर साब. रुस्तम ऐ इंदौर रहा लगातार ३ साल. होलकर राजा से सम्मानित रहा, अब ज़िन्दगी से हार गया हूँ तो सरकारी अस्पताल आ गया.
क्या करते हैं, बच्चे आपके.
…..२ हैं, एक टैक्सी चलता है और दूसरा नशा करता है . पत्नी रही नहीं.
अच्छा, बहुएं खाना देती नहीं….है न.
….मौन.
चलो अस्पताल में भरती जाओ फिर क्या. दवाई, सेवा, भोजन-फल सब पाओ और शांति से रहो १५ दिन. ठीक है.
….नहीं साब, एक महिना, मेरी सेहत सुधर जाएगी, तन को अन्न लग जायेगा तो कुछ कमाने के लिए काम कर लूँगा.
….चलो ठीक है. लोग देश को लूटे पड़े है, आप भोजन ही पाओ.
बादाम सिंह ख़ुशी ख़ुशी भरती हो गए.
चिकित्सीय कर्म बड़े परोपकार का कर्म है, धर्म है, प्रेम है , भक्ति है, हास्य है, दुःख है, सफलता है, विफलता है, निरंतर सीखते रहने की विधा है, आशा है, निराशा है, और पौराणिक उक्ति का शुद्धतम सन्देश भी है की, नर सेवा – नारायण सेवा है, की अनुपम क्रिया है
.
अस्पताल के हर दिन होने वाले डॉक्टर के राउंड के समय बादाम सिंह बतियाने को आतुर रहते, समय होता तो उनके पुराने किस्से डॉक्टर सुन भी लेते, पहलवानी से लेकर, अंग्रेजों और इंदौर के शासक होलकर का दौर, शहर समाज की रचना और अब आज का इंदौर, वे बिना रुके बोले जाते.
कह दिया एक दिन मैंने, दादा आप की याददाश्त बड़ी तेज है.
हाँ, डॉक्टर साब बचपन से एक बूटी पिताजी हमें खिलते थे.
कौन से बूटी, हमें भी बताइए,
अरे, वो तो मैं भूल गया.
हंस दिया मैं हलके से.
कहा, फिर तो दवाई फेल हो गयी याद बढ़ने की, उसी का नाम याद नहीं रहा……
खिसिया गए बादाम सिंह जैसे किसी ने पहलवान जी को पहलवानी का कोई दाँव लगा दिया हो.
बोले एक दिन, बादाम सिंह, मेरा मित्र चिरौंजीलाल बहुत बीमार है अम्बुलेंस भेज दीजिये डॉक्टर साब.
क्या हुआ है उनको?
पता नहीं, एकदम सुख गया है…..बहुत ही बीमार है….
अच्छा भेज देते है.
चिरौजीलाल ६० वर्ष, वजन २६ किलो भी इस अस्पताल में भरती हो गए. मेरे अधिकारी बोले, क्या वार्ड को वृद्धाश्रम बना लिए हो?
फिर खुद ही जवाब दिए, चलो ठीक है, दरिद्र की सेवा हो जाये अच्छा ही है.
चिरौजीलाल, प्रोटीन की कमी से पीड़ित लगे… लगे की आज गए की कल गए. लेकिन बादाम सिंह ने जमकर सेवा की, वजन बढ़ने लगा. गरीब को रोटी का हिल्ला तय हो जाये तो तनाव कम हो जाता है और मन – तन दोनों ही सुधर जाते है. पूंछ लिए एक दिन, बादाम सिंह जी मरीजों के लिए इतनी भागदौड क्यों.
नहीं साब… अपने लिए करता हु, एक्स रे करा दिया, खून की जाँच करा दी. हाथ पकड़ चले गए…सहारा दे पाखाने तक ले गए, ले आये.
वही तो, मैं पूछ रहा हूँ, इतनी मेहनत क्यों,
बोल उठे, बादाम सिंह…
जितने में आनंद आये, उतना काम करता हूँ …. डॉक्टर साब और संतोष करता हूँ.
अभी १५ अगस्त आ रही है तो देश भक्ति के गीत भी गाऊंगा और तिरंगे को सेल्यूट भी करूँगा.
मुस्कुरा दिया मैं, ६७ की उम्र में भी जीने का उत्साह बनाये रखे हैं बादाम सिंह.
जो मैंने कह दिया एक दिन कि आते मंगलवार छुट्टी कर देंगे आपकी, घर जाओ.
नहीं, अभी एक महिना और रहूँगा… चिरौंजीलाल कहाँ ठीक हुआ है अभी…. बादाम सिंह भी जिद पर अड़ गए.
अरे… ठीक तो है दादा, जब भरती हुआ था तब वजन २६ किलो था अब ३५ किलो है, उसे भी ले जाओ…..
-नहीं डॉक्टर साब, ४०-४२ किलो हो जायेगा तो हम दोनों घर चले जायेंगे.
हंस दिया मैं और बादाम सिंह भी, एक महिना बोल के दो महीने रुकने का अघोषित आश्वासन ले लिया मुझसे. समझ नहीं पा रहा था मैं कि गरीब की बुद्धि निश्छल होती है या निपट देशी आदमी का प्रेम भाव किसी अन्य दुर्भाव को पनपने नहीं देता है.
प्रेम, उर्जा, जुगुप्सा,हास्य से भरपूर और शोक, विषमता, भय, क्रोध, वित्रशना , ईर्ष्या से दूर.
१५ अगस्त के कार्यक्रम में अपने दोनों बच्चों को अस्पताल के झंडावंदन कार्यक्रम में ले गया. जब मैं चलने लगा बादाम सिंह आये…
डॉक्टर साब ये आपके बच्चे हैं.
हाँ, कहने पर शुभाशीष दिया बच्चों के सर पर हाथ रखा…. और न जाने कैसे १०- १० के २ नोट मेरे बच्चों के हाथ पर रख दिए. मेरे उपर जैसे बिजली गिरी, कहा…..
अरे दादा, आपका आशीर्वाद ही बहुत है, ये मत कीजिये.
दादा की आँख भर आये, बिना बोले, पलट गए और वार्ड में चले गए.
किन्कर्त्व्यविमुध खड़ा रह गया मैं.
दरिद्र, आशीर्वाद के साथ सर्वस्व दे देता है…ऐसा लगा जैसा नारायण स्वयं आशीष दे गए हों….

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