बरगद का दर्द
अंग्रेजों के ज़माने से मैं सीना ताने खड़ा हूँ.
मैं बरगद !!!
कहने को तो मैं एक पेड़ मात्र हूँ….उर्जा का सबसे अद्भुत स्त्रोत भी हूँ
150 बरसों से मैं खड़ा हूँ यहाँ आर्याव्रत की भूमि पर जब गाँधी का जन्म भी नहीं हुआ था. मेरे साथ रहे कई बुजुर्ग वृक्ष काट दिए गए जिन पर कभी 1857 में मची ग़दर के कई सेनानी पेड़ों पर फंसी चढ़ा दिए गए थे.मैं साक्षी रहा इस शहादतों का फिर भारत स्वाधीन हुआ और मेरे आस पास के बड़े क्षेत्र में एक पुलिस ट्रेनिंग अकादमी स्थापित की गयी. नए नवेले आरक्षकों से लेकर नए आई. पी. एस. अधिकारी तक मेरे आँगन में बने अंग्रेजों के द्वारा बने बंगले में आकर रहते रहे. नए और जवान अधिकारी 100 एकड़ के परिसर में ट्रेनिंग पाते और खेलते कूदते. सुधि और निर्मल मन के अधिपति ये युवा, नव-आरक्षक अनुशासन के साथ ट्रेनिंग करते, सुरक्षा ड्यूटी देते, खेल खेलते और मेरी छाँव में भी बैठते. कई लड़के और लड़कियों के जोड़े भी बनते देखे मैंने.
आनंदित होता रहा मैं क्योंकि मेरा आंगन हरा भरा था. फूल, बगिया, गमले, पौधे, सब्जियों के बेलें, पक्षी, कीट पतंगे और न जाने क्या क्या. पतझड़ आता तो झड़ते मेरे पत्ते और फिर नयी कोंपल आती, पडोसी पेड़ आम के बौर आते और नीलकंठ, कोयल, मोर वंश, अबाबील आदि तरह तरह के पक्षी मेरी शाखाओं पर गलबहियां करते. नीचे बंगले में नए अधिकारी अनपी नयी नवेली अर्धांगिनी से रोमांस बिखेरते, मेरे आँचल को भावना से सराबोर करते.
२१ सदी आते आते अधेड़ अधिकारी बंगले में आने को आने लगे और रात गहराते ही कभी कभी पार्टियाँ होने लगा पड़ी. जीवन में उत्साह और उर्जा दोनों माहौल में तैरते रहते.
तभी एक दिन मेरे परिसर के बंगले के रहवासी अधिकारी की मात्र 54 बरस की उम्र में ह्रदयघात से मृत्यु हो गयी.
सन्नाटा पसर गया,और मैं भी दुखी हो गया.
समय को कोई जान पाया है क्या.
इसीलिए काल को महाकाल कहा गया है जो ब्रह्माण्ड में समय, मंथर गति से सभी जीवों को उनका दर्पण दिखाते चलता है.
बंगला खाली हो गया.
3 बरस हो गए, इस बंगले में फिर कोई अधिकारी रहने नहीं आया.
अफ़सोस….
एक पनौती का काला टीका लग गया. इस बंगले पर कि जवान मौत हुई है तो अब इस बंगले में कोई रहने को तैयार नहीं है. एसा कभी होता है क्या कि असामयिक मौत का उत्तरदायित्व उस बंगले को ही दे दिए जाये.
सोच देखना प्रभु, मेरा समाज मानवों से है जब वे यहाँ रहते हैं तो रौनक की हवा बहती है अन्यथा सुना बंगला और सन्नाटा, साय साय …….मन को अच्छा नहीं लगता है.

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