प्रभु का आरक्षण
लघु कथा….
ओहो…..कब लौटे?
कल रात, देवी दर्शन कर लौटा तो सबसे पहले आपको ही प्रसाद की थैली समर्पित है, प्रभुजी।
स्वीकार कीजिये….
धन्यवाद, धन्यवाद।
मेरे अनुज जैसे मित्र की देवी दर्शन यात्रा के बाद का संवाद चल रहा था। चाय नाश्ता होने तक, मित्र अनवरत अपने जाने का, दर्शन लाभ का और वापिस आने का वृतांत सुनाते रहे। मन प्रफुल्लित था उनका, सफल यात्रा से।
अचानक उठ खड़े हुए और बोल उठे, चलूंगा भाई साब, रविवार है, सभी मित्र रिश्ते में देवी दर्शन का प्रसाद अर्पित कर दूं तो चैन से आज दोपहर में सोऊंगा।
फिर सुबह आपसे मिलता हूं, सुबह 6 बजे मॉर्निंग क्लब में, कहकर उन्होंने विदा ली।
पत्नी ने प्रसाद की थैली पूजा घर में रख दी, आज का भोजन पश्चात का मीठा देवी का प्रसाद ही रहेगा, सोचकर मैं अखबार में डूब गया।
दोपहर भोजनोपरांत, प्रसाद कटोरी में मुझे प्रस्तुत किया गया।
रेवड़ियां, चिरौंजी के साथ छुआरे (खारक) का प्रसाद.
प्रसाद माथे से लगाया, ईश्वर को धन्यवाद के साथ ग्रहण किया। छोटे छोटे बीमार से छुआरे जो करीब करीब सूखे थे, को ख़ाकर मन कुछ कसैला से हो गया कि ये व्यापारी देवस्थली को भी मुनाफ़े खोरी से बचा नहीं पाते हैं। ये रुग्ण व कृशकाय सूखे मेवे वाकई ज़ुबान ओर मन दोनों का स्वाद खराब कर दिए और में खिन्न मन से व्यावसायिक बुद्धि की मलिनता को कोसने लगा।
खैर,
रात्रि, भोजन ग्रहण कर पत्नी ने प्रसाद में फिर वही छुआरे काजू चिरौंजी इत्यादि ग्रहण करने को दिए गए। चूंकि प्रसाद को मना नहीं किया जाता है तो मैने पुनः ग्रहण किये। ग्रहण करते ही विचारों की श्रृंखला पुनः प्रारम्भ हो गयी।
लेकिन इस बार आश्चर्यजनक रुप से दिशा बदल गयी। कमजोर ,रुग्ण , कृशकाय का भी उद्धार हो जाता है जैसे ही वह प्रसाद की श्रेणी में आता है। आस्तिक के साकार ईश्वर हो या निराकार ईश्वर
……या नास्तिक के सार्वभौमिक सत्ता, उसकी शरण में कमजोर और मलिन, दया हेतु पात्र की आशा भरी याचना शीघ्र स्वीकृत हो जाती है। जो सक्षम हैं शक्तिमान है समाज की धरोहर हैं या बलवान हैं उनके लिए विज्ञान ही ईश्वर है, जो विज्ञान के सहारे स्वयंसिद्ध हो गए है और *कमजोर-बीज ईश्वर के दरबार में प्रसादि के रूप में स्वीकृत होकर स्वयंसिद्ध* हो गए हैं।
मेरा भाव झंकृत हो गया कि प्रत्येक जीव के कर्म का भाव उसके भाग्य को निर्धारित करने में सहायक है भले ही चार्ल्स डार्विन का सिद्धांत *सरवाइवल ऑफ फिटेस्ट* प्रचलित रहे।

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