जीतना क्षण भर को ……

जीतना क्षण भर को…

तुमसे जीत तो नहीं पाउँगा मैं,

सोचता हूँ, खुद को जीत लूँ…

       आगे दौड़ने की चाह बड़ी,

       हारने की साधना ही कर लूँ…

भूख तो कभी शांत न होगी,

संतोष का धन एकत्र कर लूँ..

       जटिल होना सरल हो कदाचित,

       त्याग की डगर, सरल कर लूँ…

अहंकार को तोड़ न पाउँगा मैं,

सोचा, एक बार प्रेम तो कर लूँ…

       मूढ़मति मै बुद्धि से परे, फिरता,

       न खोना न पाना, खुश तो हो लूँ…

भाग्य भरोसे कैसे बीते ये मृत्युलोक,

कर्म का पाठ तो याद कर लूँ… 

       भूत छूटा, भविष्य कोई जाने ना,

       थोडा आज के क्षण में मस्त हो लूँ…

तेरा-मेरा का भजन बहुत हुआ,

अब अंतर्मन की यात्रा तो कर लूँ,..

       मद मोह की प्रवृत्ति निपट जंजाल,

       तनिक निवृत्ति को तो हो लूँ…

रहस्यों से भरा है ये मायालोक,

कुछ सत्य, मैं भी पुकार लूँ…

       निराकार का साक्षात्कार हो न हो,

       साकार का तो निर्मल दर्शन कर लूँ…

चर अचर का ये भवसागर है,

शरीर रूपी रथ में स्थिर तो हो लूँ…

       परम को जीत तो पाउँगा नहीं मैं,

हार कर ही तुमको जीत लूँ..

Stop, to Go Ahead.

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