कहाँ हैं ईश्वर ?
ईश्वर हैं तो सामने लाओ!
पूछ बैठा मेरा पोता.
….सब परिकल्पना है, कपोल कल्पित, भरमाने का और डराने का कथानक कि भगवन, किसी रूप में हैं और वे अनादिकाल से प्रथ्वी नामक मृत्युलोक में आते हैं ,लीला करते हैं , दुष्टों का संहार करते हैं, ज्ञान चर्चा करते हैं और फिर दुनिया हमारे भरोसे छोड़कर चले जाते हैं…
पौत्र का अति ज्वालामय भाव देखकर दादा जी भी कुछ न बोले. शांत रहे. पोते का बोलना जारी रहा.
….. परम पिता का नाम दिया जो हम में से ही हमारे जैसे पुरुष रहे होंगे, कालान्तर में महामानव की संज्ञा सर्वनाम पा गए. भक्ति सेवा, ज्ञान मार्ग पर चलने लगे आँख बंद कर ईश्वर को प्राप्त करने को तो कोई रूप/रंग/रचना आदि है या सिर्फ लीला रच दी….
दादा जी भी विचार-मग्न हो, शांतभाव से जवान होते पोते के प्रश्न और शंकाएं सुनते रहे. उन्हें पता था की अभी पोते के मस्तिष्क में ईश्वर के अस्तित्व का ही प्रश्न किसान के हल के फल की भांति फंसा है अतः यह ज्वार शांत हो जाये फिर कहूँ.
…..ये कर्मकांड, तीर्थयात्रा, नर-सेवा नारायण-सेवा, गुरुनाम, उपनयन संस्कार, भगवत कथा, जमात गोष्ठी, क्या है. मात्र मतिभ्रम कि ईश्वर पहाड़ों में ,मूर्ति या भवनों में या लिंग स्वरुप में आहूत होते हैं और ये पवित्र स्थल पूजनीय बनाये गए या व्यावसायिक स्थल बनाए गए. ईश्वर है तो उसके नाम पर आतंक, ठगी, शोषण भी इन्हीं धर्म स्थलों पर क्यों हो रहे हैं. या ईश्वर ये सब देखकर आँखें मूंदे हैं. सब ज्ञान मिथ्या है जो आप्बत्ला रहे हैं हमें, हमारे बचपण से. सुन्दर काण्ड हो की महाभारत, कथा प्रसंग अधिक प्रतीत होते हैं जिन्हें पूर्वज समझना था उन्हें सर्वशक्तिमान अलौकिक पराशक्ति का महामानव बना कर सामान्य जनमानस की सामान्य से कम बुद्धि के साधारण मानव को परोस दिया की यही भोजन है, तुम्हारे मस्तिष्क हेतु. इससे अधिक सोचना भी नहीं है यही भोजन उपयुक्त है और एनी मस्तिष्क का अभीस्ट भोजन पचा न पाओगे.
दादाजी अभी भी गरलमना शांत थे. उनके जीवन का अनुभव है की समुद्र मंथन में से जब विष निकलता है तो चरों और फैलता है किन्तु उस गरल को भी नीलकंठ मिल ही जाते हैं.
….क्या हो जायेगा जो मैं आपका कथारम्य भोजन न पाऊँ और मस्तिष्क को अपने खाली रखूं. जो मन आये करूँ, ईश्वर को न मानूं, नास्तिक ही रहूँ. यह ईश्वर की अवधारणा की उत्पत्ति ही मानव निर्मित है ताकि सत्ता, मानवों पर, इसके सहारे हुकूमत स्थापित कर सके. ईश्वर से मानव डरता रहे और अपने कर्म के फल में स्वर्ग – नरक की गणना अपने सपनों में करता रहे…..
….आपके पास कोई उत्तर नहीं है. क्यों, क्यूंकि ईस्वर मात्र मस्तिष्क की खोज है. GOD IS JUST A CREATION OF MIND…..
…….GOD DOESNT MIND.
धीरे से बोल दिए दादा जी.
”ईश्वर का रूप समझने की उत्कंठा हर जीव को है. मानव, ईश्वर को अपने स्वरुप में हाथ, पैर, नाक, मुंह के आकर वाला बौर मानव के जैसा ही बुद्धि के समुचित प्रयोग करने वाला समझता है.और भी जीव हैं प्रथ्वी पर और संभवतः मानव जाती से ईश्वर पर अधिक भरोसा रखने वाले जो अपने स्थायी घर तक नहीं बनाते हैं, कोई स्कूल जाकर शिक्षा भी ग्रहण नहीं करते हैं चाहे वे नभ में उड़ने वाले पक्षी हों या पानी की मछलियाँ या स्तनपायी. कभी उन्हें ईश्वर से कुछ मांगते नहीं देखा उन्हें कभी किसिस धर्मस्थल पर जाते भी नहीं देखा लेकिन उनके भोजन ,पानी, साथी, संतान, आश्रय , स्वयं –सुरक्षा की उत्तम व्यवस्था मिली हुई है जो समान रूप से मकड़ी / मख्खी, सांप / नेवले, हिरन / बाघ सबको मिली हुई है. पृथ्वी के किसी भी जीव ने कभी भी ईश्वर को न जाना, न माना… सिर्फ इतना माना की कर्तव्य पालन हेतु मेरा जन्म हुआ है, चाहे मुझसे प्रकृति रूपी ईश्वर ने पुष्पों का परागण कराना हो या कोई भी ऐसा कार्य जो ईको सिस्टम के संतुलन हेतु अनिवार्य हो. और सभी जीव उस प्रदत्त कार्य को करने के लिए उद्यत भी रहते हैं. यदि कोई पक्षी या मछली ईश्वर के अस्तित्व में होने का प्रश्न करे,ईश्वर के होने की कल्पना करे तो वे भी अपने स्वरुप जैसे ईश्वर की कल्पना करेंगी. जैसे मानव, ईश्वर का साकार रूप अपने मानव के रूप जैसा देखता है.”
एक सांस में बोलते जा रहे थे दादाजी.
सूखा गला, गीला करने के लिए दादाजी ने एक गिलास पानी पिया, जबकि पोताजी विस्फारित आँखों से ईश्वर नामक संस्था का स्वरुप और कार्य प्रणाली समझने का प्रयास कर रहे हैं.
“ईश्वर उर्जा है, जो सूर्य के रूप में पूरी प्रथ्वी को प्राप्त है. ईश्वर नभ है जिसके पोषक तत्वों की सूर्य किरणें छान कर नीचे प्रथ्वी पर आती हैं…
“ईश्वर धरती है, जो निर्जीव है किन्तु बीज पानी मिलते ही अनाज, खट्टे मीठे फल पैदा कर देती है और बिना किसी भेदभाव के समस्त जीवों के उदर को भोजन से भर देती है….
“ईश्वर जल है जिसके बिना किसी भी जीव का जीवन संभव नहीं है….
“ईश्वर अग्नि है जिसके द्वारा पाचन होता है और जीवन के हर तत्व का जीवन चक्र पूरा होता है. जीवन के ये पञ्च महाभूत तत्व से शरीर का जल में समायोजन हुआ और सबसे पहले अमीबा बना जो एक कोशिका का प्रथम जीव था प्रथ्वी पर…..
“उसके इवोल्युशन याने विकास की यात्रा बहुकोशिकीय हुई, फिर रीढ़ की हड्डी वाले जीव हुए और फिर स्तनधारी जीव के पैदा होने के बाद करोड़ों वर्षों में प्रथ्वी इस स्थिति में आई कि होमो सेपिएन्स आधुनिक मानव के रूप में थलचर है, नभचर है और तो और जलचर भी है अर्थात ईश्वर नामक उर्जा या प्रकृति ने मानव के रूप में जो कृति विकसित की है वह आज जल, थल और नभ में आसानी से विचार सकती है, उड़ सकती है, तैर सकती है. विज्ञान के ज्ञान ने हमें बताया है की प्रथ्वी के कितने भाग में थल और कितने भाग में जल है. संतुलन बनाये रखने के लिए ये अनुपात गणना की गयी होगी कभी न कभी किसी के द्वारा. वायुमंडल को लें तो प्राणवायु ऑक्सीजन 21% है जबकि नाइट्रोजन 78%. आखिर क्यों नहीं भर दी पुरे वायुमंडल में ऑक्सीजन . ईश्वर को पता रहा होगा की ऑक्सीजन ज्वलनशील गैस है, सब जला देगी तो 21% के स्तर पर रोक दिया जबकि नाइट्रोजन तो अज्वलनशील है तो मात्र बाधा दी. किसी ने तो ये सब सोचा होगा जब बिग बेन्ग थ्योरी से प्रथ्वी के आग का गोला होने की बात समझ आ थी जो नीरवत या अंतरिक्ष में कहीं जाकर टिकी बिना किसी सहारे के, जिसे स्टीफेन हाकिंग्स ने स्ट्रिंग थ्योरी से बांध दिया.उस अलौकिक सत्ता ने एक गुरुत्वाकर्षण बल दिया प्रथ्वी पर जिसे आप 9.81 मी./सेकंड से गणना करते हैं. एक चाँद भी दिया प्रथ्वी को और ऐसा बंधा ईश्वर ने उसको की आज तक वो प्रथ्वी पर गिरा नहीं है बल्कि प्रथ्वी को अपनी उपस्थिति पूर्णिमा- अमावस्या, ज्वर- भाटा और सूर्य-चन्द्र ग्रहण से दिखता रहा. भले मानव चाँद से मिटटी ले आया लेकिन सोचा कभी तुमने कि, विज्ञान का अहंकारी, ये धुरंधर मानव मिटटी जैसी उत्पादक वास्तु आज तक न बना पाया… जो बीज मात्र से वृक्ष बना दे, मीठे, खट्टे, तीखे, नशीले या स्वाद – हीन फल और फूल बना दे. कोई तो होगा कहीं जिसे तुम साकार रूप में देखना चाहते होगे अपने अहंकार को जीतने के लिये जो तुम्हारे दादा जी प्रत्यक्षतः तो दिखा न पाएंगे परन्तु महसूस करा पाएंगे की मानो तो ईश्वर है पत्थर में, न मानो तो जीवन भी जड़ है. सोचा कभी कि तुम्हारी पैदाइश भी जेनेटिक इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना है….
पोता जी की आंखें विस्मयादिक बोध के साथ खुली थीं.
”स्त्री पुरुष या किसी भी जीव के विपरीत लिंगों के बीच सम्बन्ध स्थापित होता है तो वीर्य के शुक्राणु और अंडाणु घटाटोप अँधेरे में मिलते हैं और युग्मन पूरा कर 9 माह में मानव का एक पर्ण विकसित शिशु बना देते हैं,किसी प्रकार की बाहरी सहायता के बिना. सोचा कभी पैदा होने के तुरंत बाद शिशु को माँ के अंचल से दूध प्राप्त हो जाट है. कह सकते हो आप की ये तो हॉर्मोन से नियंत्रित है तो बताना मुझे जरा ये हॉर्मोन किससे नियंत्रित हैं? कभी माना इसे कि यह चमत्कार है. विज्ञान अनिवार्य है, विज्ञान की समझ भी अनिवार्य है किन्तु समझने का प्रयास करें तो हमारी विज्ञान की समझ भी मंद और कुंद हो जाये, जब यह कहा जाये की प्रथ्वी जैसी 13 लाख प्रथ्वियाँ हमारे सौर मंडल एकमात्र चमकते तारे सूर्य के आकर में समा सकती हैं….और इस ब्रह्माण्ड में सूर्य जैसे हजारों तारे हैं, जिनमें ये हमारा सूर्य नामक तारा सबसे छोटे तारों में सम्मिलित है. आश्चर्य नहीं लगता हैं यह सुनते और सोचते कि हमारी हैसियत इस ब्रह्माण्ड में क्या है…..
”ईश्वर की अवधारणा दोधारी है,वो आकार से हमारी बुद्धि में समा नहीं सकता, हमारी समझ में हमारे संकीर्ण और सूक्ष्म ज्ञान में समा नहीं सकता तो समझ में क्या आना है. और ईश्वर की दूसरी धार इतनी सूक्ष्म और आसानी से समझ आने को तैयार है कि हर मानव को ईश्वर प्राप्त हो सकता है. प्रेम और करुणा का ये भाव हमें ईश्वर की अव्यक्त परिभाषा को भी समझा सकता है क्यूंकि…
ईश्वर प्रेम भाव में स्थित हैं,
उत्साह में समाहित हैं,
श्रृंगार में प्रदर्शित हैं,
वीरता में धर्म रक्षित हैं,
शांति में मौन हैं
तो रौद्र / वीभत्स / भयानक रसों में भी विद्यमान हैं.
जन्म- मृत्यु, आमोद-प्रमोद, धन- निर्धन, रोगी – प्रमादी और स्वर्ग – नरक के दो ध्रुवों के बीच ये जीवन, काल का यवन है जो प्रत्येक बीतते क्षण के साथ तुम्हें तुम्हारी ड्यूटी रूपी धर्म की याद दिलाता है, छोड़ना भी सीख, माया में सदैव के लिए न उलझ. ईश्वर भले ही द्रश्यमान न हों किन्तु संत तुलसीदास के शब्दों में,
यह जगत द्रश्यमान है एवं तुम्ही द्रष्टा हो.
सत् रूपी विष्णु, रज रूपी ब्रह्मा और तमोगुण रूपी शिव के मूलतत्व Generator, Operator और Destroyer के रूप में जगत लीला में प्रचालन में हैं. इस तीनों राज, सत्व तथा तमो गुणों के परिचालक तुम ही हो अर्थात ब्रह्मा, विष्णु और महेश को तुम्ही नाचा रहे हो और ये तीन गुण के त्रिदेव, देह के भीतर विराजमान प्राणशक्ति द्वारा ही संचालित होते हैं. हमारा शरीर 600 अरब कोशिकाओ से संचालित हैजो किसी फैक्ट्री के जैसा कार्यशील होता है. इसी काया से प्राण या आत्मा या उर्जा के मुक्त होते ही 600 अरब कोशिकाओं का यह शरीर माटी का लोंदा हो जाता है.तो आत्मा या उर्जा या स्पिरिट कहाँ से जीवन की रचना करती है क्या हम जानते हैं.
नहीं!
संभवतः जान भी नहीं पाएंगे. सोचा कभी तुमने कभी कि, यह कैसे हो सकता है की एक ही दिशा में चलते चले जाओ और प्रस्थान बिंदु पर ही पहुँच जाओ. प्रथ्वी या ब्रह्माण्ड का किसी भी और कोई ant नहीं है, नहीं तो उसकी किनारी अवश्य होती. ईश्वर की रचना का जो चित्र हम अपन मानस पटल पर बना लेते हैं, ईश्वर, उस रचना की आकृति से विशाल है और इसी क्षण में समाहित भी है.क्यों कहा जाता है कि ईश्वर धर्मस्थलों में, पाषाण-पत्थरों में, मजार, गुरुद्वारों में नहीं है और आसन रूप से तुममे तुम्हारे भीतर ही मौजूद है तो ईश्वर का साक्षात्कारकरने के लिए भी बीतर की यात्रा करो. हर जीवित को ईश्वर प्रदत्त विवेक की अनिवार्य तथ्यपरक क्षमता दी है और किसी भी कार्य में सही गलत की शिक्षा आपके ह्रदय या मस्तिष्क, जो आप समझें, से यह विवेक की आवाज आती है की आप यह कार्य करें और यह न करें. कहा जा सकता है की ईश्वर समय है, यहाँ यही एक पल में है और पल स्थिर नहीं है , निरंतर चलायमान है और आप / हम /सब भी उसी पल की घडी के कांटे पर सवार हो यात्रामान हैं. साकार रूप ले दर्शन की कामना हम सब की है इसीलिए साकार रूप का दर्शन करने तीर्थस्थलोंकी यात्रा की जाती है.विशुद्ध रूप से यह प्रकृति दर्शन की यात्रा है जो उर्जा के स्वरुप होकर ईश्वर के प्रतीक हैं.प्रकृति , उर्जा का रूपांतरण है. और हम भी शरीर रूप में भी प्रकृति अथवा अद्रश्यमान उर्जा के हिस्से हैं. अतएव हम ईश्वर रूपी उर्जा ही हैं. अपने अल्पज्ञान से हम ईश्वर के चमत्कारिक रूप की काल्पन करते है और मन ही मन किसी विशेष रूप से सम्मोहित हो जाते हैं. जबकि वह सम्मोहिनी उर्जा अंतर्मन में ही सन्निहित है. आश्चर्य लगेगा की तुम्हारे भीतर की यात्रा भी तुम्हें भीतर से प्रारंभ करना होती है. साकार रूप की प्राप्ति के लिए पूजा – अर्चना, साधना- आराधना और कई कलयुगी कर्मकांडों से मानव मन को लुभाती है, असना मार्ग बताती है फिर भरमा देती है. आधुनिक सन्दर्भ में देखा जाये तो जैसे एक कंप्यूटर में हार्ड डिस्क, मिस्क्रोचिप्स, मोठेर्बोअर्द, मॉनिटर, सी पी यू, रेम आदि होते हैं और उसके निर्माता को आप इंजिनियर कहते है उसी प्रकार इस शरीर रूपी कंप्यूटर में मस्तिष्क, चेहरा, ह्रदय- फेफड़ों के साथ-साथ चेतन – अचेतन व अवचेतन मन की भी स्थापना की गयी है वह भी आपके जाने बगैर. गुणसूत्रों याने जींस से लदा यह आपका शरीर आपके पूर्वजों के स्वाभाव और जीवनशैली में आपके कठोर प्रदर्शन की क्षमता जैसी मानसिक शक्तिओं से फलित है. जो कैसे कार्यशील होती है कहना, समझना और समझाना दुष्कर है. लेकिन किसी कारण से यह शरीर पैदा होने के बाद से अनंतर चलायमान ही रहता है.माया को भोगता हुए और समय को पार करते हुए. क्या यह चमत्कार से कम है और यह कर कौन रहा है. अवतार के रूप में निर्बल बुद्धि की आशंका होना स्वाभाविक है तो साकार रूप से निराकार की भक्ति और ant में परम पिता अलौकिक सत्ता से साक्षात्कार की परिणिति भी जीवन के स्तापित कर्मों में सम्मिलित है. कर्म का सिद्धांत जो भगवतगीता में रचित है वह इश्वर प्रदत्त कार्य को संपन्न करने में ही ईश और जीवन दोनों का दर्शन है. कहते हैं न कि, You are your hell & your heaven too!
तो क्या देखा है कभी, स्वर्ग या नरक. नहीं न, वह हमारी अवधारणा में है, जैसे फिजिकल और मेटा फिजिकल में अंतर है. फिज़िकल यने भौतिक स्वरूप में माया/मोह/ मद/ लोभ में बिंधे हुए और मेतफिज़िकल याने मन से सम्बंध रख्ने वले. दोनो का अस्तित्व भिन्न है,जैसे मकान भौतिक स्वरूप में उपस्थित है छू सक्ते हैं, देख सक्ते हैं, भोग सक्ते हैं जब्कि घर वो है वह मांसिक अवस्थ है जो परिजनोन और भौतिक मकान के मन कि अवस्थ है. सोने के सिक्के को भौतिक रुप प्राप्त है परंतु इस सोने के सिक्के क मुल्य इस सिक्के के किसी पदार्थ को क्रय करने शक्ति को मेटा फिजिकल या आध्यात्मिक माना जायेगा. याद, सिर्फ इतना रखो कि
मैं नश्वर प्रकृति के परे अनश्वर, शाश्वत और अमर सत्ता हूँ और प्रथ्वी पर देवांश हूँ….
इश्वर को देखने, उससे बात करने की बात, बहुत आवेगपूर्ण लालसा है.
ईश्वर को देखने की जगह, ईश्वर को सीखो.
ईश्वर को सीखने के लिए संवेदना जगाओ, ईश्वर की श्रद्धा के साथ जिज्ञासा को पोषित करो. अनुकरण न करो, आत्म-खोज करो. ईश्वर को पाने का रास्ता जोवों के लिए भिन्न है. सभी मार्ग, मुख्या मार्ग हैं और अंतिम बिंदु तक सभी एक साथ पहंचते हैं. धर्म सीढ़ी हो सकता है, मजिल नहीं. परमतत्व की परिभाषा हरेक के लिए भिन्न हो सकती है, जैसा मन वैसा भगवन. रावण भी पूज लिए जाते हैं और बुरी भावना को संग रख शिव की आराधना भी कर ली जाती है कि ईश्वर मेरा ही साथ देंगे. ईश्वर नहीं, आप स्वयं देवांश हैं और विवेक से जो आप सोचेंगे, ईश्वर उसका समर्थन ही करेंगे. वृत्ति, प्रवृत्ति का साधन चतुष्टय: के साथ पालन ईश्वर को पाने में नहीं, समझने में सहायक है.
जीवन में जन्म ईश्वर है,
मृत्यु ईश्वर है,
सुख ईश्वर है,
दुःख ईश्वर है
स्वस्थ शरीर ईश्वर है,
रोगी शरीर ईश्वर है,
कर्म ईश्वर है,
अकर्म ईश्वर है,
प्रेम ईश्वर है,
घराना ईश्वर है,
विवेक ईश्वर है,
क्रोध ईश्वर है,
विवेक ईश्वर है
सौन्दर्य ईश्वर है,
कुरूप ईश्वर है,
ईश्वर को मानना ईश्वर है,
ईश्वर को न मानना इश्वर है,
आस्तिक भी पोषित है,
नास्तिक भी पोषित है,
जीवित भी पोषित है,
मृत भी रीसाइक्लिंग के लिए पोषित है,
मुखर भी ईश्वर से पोषित है,
मौन भी ईश्वर से पोषित है.
मानो तो क्षण प्रतिक्षण ईश्वर है न मनो तो विज्ञान है.
ईश्वर में विज्ञानं है, विज्ञानं में ईश्वर है.
तुम्हारे ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न होने में ईश्वर है,
कण में ईश्वर है
परमाणु में ईश्वर है,
सूर्य में ईश्वर है,
ईश्वर में ईश्वर है,
नाम चाहे जो दो कि यह सब विज्ञानं है, उर्जा का, न कभी पैदा होने या न कभी नष्ट न होने वाला सिद्धांत का अविकल प्रवाह है.
क्षण, कण का यह समावेश उर्जा से संचालित होकर ईश्वर रूप में कल्पना से परे है.

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