ओजमयी आलोक

ओजमयी आलोक….

भास्कर कभी रुकता नही, तेज उसका थमता नहीं,

एक ओर से चला जाता है, कभी ये रवि, थकता नहीं…1

दिनोंदिन ऊर्जा दान करते, गर्व से दिवाकर, अकड़ता नहीं

संत हो दुष्ट हो पंछी-पौधे के पोषण में, भेदभाव ये करता नहीं…2

समंदर का आलोक क्षण भर में भानु भाप बन जाता है

बून्द बारिश की बन के , ऊर्जा स्वरूप बदलता नहीं?….3

कल्प दर कल्प आग की ये बौछार से जीवन उपजाता,

सृष्टि सृष्टा, दृष्टि दृष्टा का मेल अनोखा भूलता नहीं…4

जय हो, दिनेश का यह उद्घोष, चहुँ ओर परचम फहराएगा,

रोक सके कोई, ऐसा मानुष शक्ति कोई दिखता नहीं…5

भले विज्ञान खोल दे सूर्य की परमाणु विखंडन-संलयन की परतें,

कौन, हरिण्यगर्भाय को जलाता सदियों से, मन में समझता नहीं…..6

दूर हो धरा से तो सर्द कर दे, निकट आये मित्राय, तो मौसम गर्म,

फसल को पका दे, ऊर्जा कैसे भर दे, अरुण, कभी जतलाता नहीं…..7

आठ पहर का जीवन, नारंगी सी गोल ये धरा अनमोल,

दायित्व जैसे पूरा भानवे का, फिर भी कृतज्ञ इंसान होता नहीं….8

इधर रात अंधियारी , उधर दिन उजियारे का मनमोहक समय,

काले सफेद का औघड़ नाटक, मरीचये  कभी भी अटकता नहीं।…9

कभी बोले दिनकर, महीने भर की छुट्टी लूंगा, न उदय… न अस्त,

सोचो, कैसे धर्म के पुरोधा चला पाएंगे …..ये कोई समझता नहीं।…10

गति निरामय, प्रकाश साकार, मार्कन्डेय भाव-भेद का न कोई,

प्रभाकर , जीवन दाता, जैसी और कोई विलक्षणता नही।…11

नरोत्तम हो या नराधम, होता कदाचित किंचित भी कृतज्ञ नहीं,

मानो न मानो, ह्रदय अर्काय के लिए, मानव का  धड़कता नहीं।…12

वीतराग को जो जाने, आदित्य को समझे मन उज्जवल,

आत्मा रूपी सावित्रेय को हृदय से कोई दुलारता नहीं।….13

पूस माहे उत्तरायण की गति है तो आसाढ़ मध्ये दक्षिण,

अलौकिक सत्ता, सप्त अश्र्व वाहन के चालक बलिहारी…14.

Almighty Sun

Leave a comment

Blog at WordPress.com.

Up ↑