दर्शनीय लद्दाख: पहाड़ों में सौंदर्य
भारत का ग्रैंड कैनियन – लेह का सड़क मार्ग
देवभूमि भारत विविधताओं से भरपूर है जहां तीन ओर से समुद्र है तो सागरमाथा हिमालय की गगनचुम्बी चोटियाँ उत्तर से देश की सुरक्षा को प्राकृतिक रूप से उपस्थित है. हिमालय की लम्बी श्रंखला में गजब का सौन्दर्य है ओर ऐसा ही लुभावना प्रदेश है हिमालय में, लद्दाख जो भारत के उत्तर में कश्मीर क्षेत्र का मोर-मुकुट है जो चमकती मणि की भांति अपने नैसर्गिक सौंदर्य से आलोकित है जहां आपके नैन थक जाएंगे परंतु प्रकृति का सौंदर्य आपके समक्ष बिखरा हुआ दिखता रहेगा. इन क्षेत्रों में कारगिल-द्रास के अतिरिक्त लद्दाख की राजधानी लेह, नुब्रा वैली, तुर्तुक, सरचू- केलोंग ओर स्पीति जैसे क्षेत्रों में समय बिताना किसी भी प्रकार से स्वर्गिक यात्रा से कम प्रतीत नहीं होता है. इन क्षेत्रों में आसमान छूते बर्फ से ढके पर्वत श्रृंखलाओं के साथ-साथ सड़क के निकट स्थित पहाड़ों के दिव्य दर्शन भी किसी दावत से कम नहीं है. जहां 10000 फीट की ऊंचाई के बाद पर्वतों-पहाड़ों पर पेड़ों की हरियाली समाप्त होने लगती है और नग्न पहाड़ अपना अप्रतिम सौंदर्य जैसे थाली में रखकर परोस देते हैं. कुछ भंगुर से भूरे पहाड़, कुछ गुरु गोरे से पहाड़ जो फिसलने को सदा तैयार या कुछ भगनावेशी ग्रेनाइट पत्थर से चमकते स्थिर पहाड़ जो आपको घूरते नजर आते हैं.
लद्दाख क्षेत्र में नदियों की भी एक विस्तृत श्रंखला उपलब्ध है जो छोटी नद जैसे श्योक, नुब्रा, द्रास, गलवान ओर सुरु के साथ बड़ी नदी जैसे पवित्र सिंधु, जंस्कार, पारंग और सोत्सो से लद्दाख का अद्भुत सिंगार करती हैं. इन पहाड़ों के आगोश में बहती यह नदियां सड़क मार्ग से आप के दृश्य-दर्शन को अपने कल-कल जल से अभिभूत कर देती हैं और सूर्य की दमकती किरणों के जल की सतह पर पड़ते हो चमकते द्रश्य को देख आप विस्मित होने से स्वयं को रोक नहीं पाते हैं. बेहतर मार्केटिंग के चलते अमेरिका के ग्रैंड कैनियन की यात्रा का लोग अतिशय आकांक्षा है जबकि ग्रैंड कैनियन से बेहतर प्राकृतिक सौंदर्य का समायोजन पहाड़ और नदी के रूप में लद्दाख प्रदेश के लिए पहुंचने के दोनों सड़क मार्गों पर बिखरा पड़ा है चाहे आप श्रीनगर होते हुए लेह – लद्दाख पहुंचे या मनाली-रोहतांग-सरचू हो कर लेह पहुंचे. यदि आप मनाली होकर सड़क से 480 किलोमीटर की दूरी की यात्रा करते हैं तो भंगुर पहाड़ों और दूरस्थ पर्वतों के अद्वितीय दर्शनों के साथ-साथ प्राकृतिक रूप से बने किलेनुमा रचनाएं भी दिखाई देती हैं जो संस्कृत की ऋचा जैसी प्रतीत होती हैं जिन्हें देखकर आप चकित रह जाते हैं. उसी प्रकार श्रीनगर कश्मीर से लेह का मार्ग 425 किलोमीटर का है जो अमरनाथ शिव धाम के बालटाल केंद्र के साथ-साथ पहाड़ो की चढ़ाई चढ़ते द्रास ओर कारगिल क्षेत्र होते हुए तक पहुंचा जाता है. मार्ग में उत्साही युवक युवतियां अपनी मोटरसाइकिल और पहाड़ों की सड़क से ऊंचाई की प्रतिद्वंद्विता करते हुए दूरियां नापते मिलते चलते हैं जो उत्साह और जोश से भरे होते हैं.
पहाड़ों की सुंदरता के विविध रंग इस क्षेत्र में आपको लगातार सम्मोहित करते हैं जो कहीं चमकीले ग्रेनाइट जैसे तो कहीं पत्थरों से लदे कभी भी पहाड़ की सड़क पर आने को तैयार दिखते हैं. कही भूरे रंग के पहाड़ जिनके वर्ण कभी कही लाल कुछ गुलाबी तो कुछ श्यामवर्ण दिखते हैं. तात्पर्य यह है कि यदि आपका मन संवेदनशील हों और कुछ नया देखने को आतुर हों तो लेह की सड़क यात्रा में ही संपूर्ण आनंद की प्राप्ति हो जाती है जब जीवन के पंचतत्व भू, जल, आकाश, वायु और सूर्य रूपी अग्नि के विभिन्न रंगों से निरंतर साक्षात्कार होता जाता है और आपकी दोनों आँखो का सुख व मन की प्यास भी कम पड़ने लगती है।
लद्दाख बौद्ध धर्मावलंबियों का प्रदेश है जहाँ हीनयान-महायान धर्म पद के कई पवित्र मठ हैं, जिन्हें मोनास्ट्री कहा जाता है जो राजधानी लेह के उत्तर व पश्चिम में स्थित है। शांति ओर आध्यात्म को समर्पित ये मठ अलची में लगभग 1200 वर्ष पूर्व से स्थापित किए गए हैं, जबकि उत्तर पूर्व स्थित डिस्केट में लगभग 800 वर्ष पूर्व स्थापित मठ तथा लामायुरु अथवा लेह में स्थित ठिकसे मठ हम भारतीयों के लिए बड़े ही दर्शनीय स्थल है। बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए लेह शहर में स्थित ठिकसे मठ तथा अन्य क्षेत्रों के मठ जैसे डिस्किट, अलची और लामायुरू में स्थित मठ, हिंदुओं के शिव ज्योतिर्लिङ्ग मंदिर की भांति पवित्र पूजनीय माने जाते हैं जहाँ देश-विदेश से बौद्ध धर्म के महायान-हीनयान मार्गी दर्शन को उपस्थित होते हैं. इन अर्वाचीन मठों में अजब सी शांति की अनुभूति होती है जहाँ गेरुए या लाल रंग के पवित्र वस्त्र पहने बौद्ध गुरु समाधिलीन होते हैं, जिनके दर्शन भी होते हैं। अलची मठ में लामा रिन्चेन जेनपो (958-1055) का नाम कई बार आता है जिन्होंने तिब्बत से आकर इस मठ में रहते हुए 1000 वर्ष पूर्व सनातन ग्रंथों जैसे उपनिषद, पुराण आदि का संस्कृत से तिब्बत भाषा में अनुवाद किया. अलची स्थित मठ की दीवारों पर महाराष्ट्र में स्थित अजंता की भांति विभिन्न रंगों में बने अनगिनत भित्ति चित्र इतने सुंदर हैं कि वे बस आपका मन मोह लेते है. यहाँ 13 फिट ऊंची अवलोकितेश्वरा, 17 फुट ऊंची मैत्री व 13 फुट ऊंची मंजूश्री की तीन भव्य मूर्तियां हैं, जो क्रमशः करुणा, मैत्री व विवेक के प्रतीक हैं. अलची में स्थानीय बाजार भी स्त्री-पुरुष यात्रियों को क्रय करने को सम्मोहित कर ही लेता है. राजधानी लेह में स्थित ठिकसे मठ या गोम्पा किलेनुमा मठ है जो अपनी सुंदरता में अन्य मठों से अधिक मन मोह लेता है, जो लेह से मात्र 20 किलोमीटर सिंधु नदी के उत्तर में स्थित 11,800 फिट की उचाई पर है जिसकी स्थापना 1430 में हुई थी। इस मठ का मुख्य आकर्षण है बुद्धा की 50 फिट ऊंची मूर्ति जो 14 वें दलाई लामा के आगमन पर 1970 में बनाई गई थी। यह मूर्ति इंडोर प्रतिमा होकर भवन के दो मंजिले की ऊँचाई में बनी हुई है। लेह से 120 किलोमीटर दूर एक रमणीय स्थल डिस्कीट पर भी एक महायान बौद्ध मठ में स्थित खुले आसमान के नीचे मैत्री बुद्धा की विहंगम मूर्ति दूर से ही आकर्षित कर लेती है। कई अविश्वसनीय कहानियां यहाँ कही सुनी जाती हैं जो नागलोक से सम्बंधित हैं. वास्तव में मैत्रीय बुद्धा को आगामी अवतार माना जाता है, जिनके भविष्य में कभी अवतरित होने का कथन बार बार प्राप्त होता है जो समाज की शुद्धता को पुन स्थापित करेंगे. इस मूर्ति के आधार पर सैकड़ों बौद्ध धम्म चक्र यानी माने लगाए गए हैं जिन्हें यात्री घड़ी की दिशा में लगातार घुमाते हैं जो मंत्र के उच्चारण जैसे पवित्र माने जाते हैं तथा वे ओम नमः शिवाय जैसे बोध-मंत्र के उच्चारण के प्रतीक माने जाते हैं. अन्य मठ लामायुरू में भी बौद्ध धर्मावलंबी बड़ी संख्या में निवास करते हैं, जो लेह के पश्चिम में लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित है. पहाड़ों की चोटियाँ पर स्थित यह मठ ऊपर से नीचे की धरती और ऊपर से आसमान का अप्रतिम दर्शन कराते हैं. जब हल्की हवाएं आपके तन को होले होले सहला देती है तो शरीर की थकावट समाप्त हो जाती है और मन, आशा ओर उल्लास से प्रफुल्लित भी हो जाता है. इन मठों की यात्रा आपके आध्यात्मिक मन को जगा देती है, परंतु इन सरल स्वभाव के पहाड़ी बौद्ध धर्मावलम्बियों का पूरा देश तिब्बत अहिंसा के पाठ की भेंट चढ़ गया, जो आज भी चीन के आधिपत्य में है और सीधे इन सीधे मतावलंबियों के पक्ष में तलवार उठाने वाला आज कोई भी नहीं है. लेह में चस्पा क्षेत्र में एक भव्य श्वेत वर्णीय स्तूप भी यात्रियों के आकर्षण का केंद्र है जो 1991 में जापान के भिक्षु नाकामुरा के शांति मिशन का प्रतीक है जिसे विश्व शांति स्तूप भी कहा जाता है जहाँ भगवान बुद्ध की मूर्ति स्थापित है. यह ऊँचाई पर स्थित दर्शनीय स्थल है जहाँ से लद्दाख राज्य की राजधानी लेह का पूर्ण दर्शन हो जाता है। आकाश में कभी कभी भारतीय सेना के लड़ाकू जहाज के उत्तेजित करने योग्य दर्शन भी हो जाते हैं जो नभ में एक लकीर सी बनाए चले जाते हैं।
लद्दाख अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है जहाँ समुद्री पानी आने खारे पानी की झील पेंगॉन्ग शो है जो 11000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है वहीँ उत्तर के ठंडे प्रदेश में नुब्रा वैली में रेगिस्तान की उपस्थिति आपको आश्चर्यचकित कर देती है जहाँ पर दो कूबड़ वाला रेगिस्तान का जहाज ऊंट भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराता मिलता है. यहाँ नुब्रा वैली में मन को लुभाते दर्शनीय रेत के ढेर हैं ओर सूर्य की लंबवत किरणों भी त्वचा को जलाने के लिए उपस्थित हैं जबकि पानी की धारा के साथ छोटी नदी नुब्रा भी इन रेत पठारों के बीच में बहती है. यह दृश्य ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी बच्चे ने इस नुब्रा वैली में पेन्सिल से इस चित्र को बनाया है. प्रकृति का बचपन यहाँ देशी-विदेशी यात्रियों को बचपन के नए रंग से आलोकित कर देता है और संतोष का एक नए भाव से भर देता है.
नैसर्गिक सौंदर्य के लिए लेह से 160 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर दिशा में नुब्रा वैली स्थित है जहाँ इतनी 10,000 फिट की उचाई पर रेगिस्तान उपलब्ध हैं जो अपने दोहरे कूबड़वाले, ऊंट, रेत के टीले, भंगुर पहाड़ के दर्शनीय श्योक नदी से भी साक्षात्कार कराते हैं. इस स्थान पर सूर्यास्त को देखने का आनंद अप्रतिम है. जब पहाड़ की चोटी पर पश्चिम को जाते सूर्यदेव मणि की भाँति आलोकित होते हैं. नुब्रा वैली का सड़क मार्ग सौंदर्य से भरपूर है जहाँ आपकी पहाड़ों पर बनी सड़क पर जाने वाली यात्रा भय के साथ साथ आश्चर्य और नयनसुख से भर देती है जब साथ में बहने वाली नदी का कलकल करता शोर और पहाड़ों का विभिन्न रंगों जैसे भूरे, लाल ग्रेनाइट कहीं चमकीले कहीं हल्के नीले या काले रंग का साक्षात्कार निरंतर होता रहता है और यह चिंतनशील पहाड़ आपका मन मोहते रहते हैं. उत्साह से भरे दर्शन करते हुए यात्रीगण अकल्पनीय रूप से निशब्द हो जाते हैं. नुब्रा घाटी के रास्ते में विश्व का सबसे ऊंचा सड़क मार्ग पर स्थित घाटी-दर्रा खारदुंगला से भी आप गुजरते हैं जो लगभग 18,000 फिट की उचाई पर स्थित है जहाँ सेना की चौकी भी है। खारदुंगला पर्यटकों की नैनसुख का विशिष्ट केंद्र है जहाँ चारों ओर पर्वतों की छुट्टियों पर जमा हिम के सुंदर दर्शन होते हैं जो कि जो संजोकर रखे जाने योग्य चित्र लेने के अनगिनत मौके देता है. यहाँ का तापमान भी चार से छः डिग्री सेल्सियस तक रहता है और ठंडी हवा का झोंका यहाँ आप के तन को सुई की नोक की भांति भेद देता है। लेह से 222 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में पेंगोंग झील स्थित है जो लद्दाख में अपने रूप लावण्य के कारण पर्यटकों में अति लोकप्रिय है। हिंदी फ़िल्मों की इस स्थल की शूटिंग में हम भारतीयों को इस स्थल का प्रशंसक बना दिया है और कैमरे से कई बार इस झील को टीवी सिनेमा में हम देख चुकने के बाद भी पर्यटक अपनी आँखों से इस झील के पवित्र दर्शन के लोगों का संवरण नहीं कर पाते हैं और चुंबक की भांति अप्रैल से अक्टूबर के मध्य इस झील के किनारे आ जाते हैं. यहाँ भी ठहरने की उत्तम व्यवस्था है, जो स्विस टेंट या प्लाय हाउस के अस्थायी रहवासों में आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं. इस झील का रंग कहीं नीला कहीं पारदर्शी और कहीं कहीं लाल भी दिखाई पड़ता है। आश्चर्य होता है कि यह 13,860 फ़ीट पर स्थित यह समुद्री झील है यानी खारे पानी की झील, जो लाखों वर्ष पहले महाद्वीपों के टकराव से हिमालय पर्वत श्रृंखला के आगोश में आ गई थी और आज तक खारी बनी हुई है, जिसमें कोई पादक या जीव नहीं उपस्थित है. 134 किलोमीटर लंबी इस झील का एक तिहाई हिस्सा भारत मैं तथा शेष तिब्बत में स्थित है जो पूर्वी लद्दाख से पश्चिमी तट तक फैला हुआ है. खारे पानी की होने के बावजूद यह झील ठंड के मौसम में जम जाती है। इस झील का आकर्षण है कि इसका रंग जो हल्के हरे से लेकर नीले रंग के साथ साथ सुनहरा, लाल या गुलाबी भी दृष्टिगोचर होता है। इस झील के नेपथ्य में भिन्न रंग के चिकने पहाड़ इस झील के सौंदर्य को द्विगुणित कर देते हैं, जो भूरे, काले, लाल रंग के अलग अलग स्थान पर दिखाई पड़ते हैं। इस झील पर दिन के किसी भी समय आप उपस्थित हो अति ठंडी हवाएं आपका हृदय से जैसे स्वागत करती प्रतीत होती हैं और झील की ये लहरें इसे अनुपम सौंदर्य प्रदान करती हैं। आसमान का दमकता नील वर्ण और पृथ्वी के ईष्ट सूर्य का आलोक इस स्थान पर पर्यटकों को चित्र बनाने के मनमोहक मौके प्रस्तुत करते हैं. खुला आसमान, लहरों से भरी झील ठंडी बयार उसका बहना और खुला मैदान इस झील को आकर्षक बना देता है।
लेह 11,480 फिट की उचाई पर स्थित राजधानी है जो छह माह बर्फ से आच्छादित रहती है. अप्रैल से अक्टूबर तक भी खुले आसमान के नीचे लेह का तापमान 15 से 25 डिग्री के मध्य ही रहता है. यहाँ के घरों, होटलों और कमरों में पंखे या ए.सी. नहीं होते हैं और होटल में रेफ्रिजरेटर की आवश्यकता भी नहीं होती है. यह क्षेत्र इन छह माह में भी पर्याप्त ठंडा रहता है, जो पर्यटकों के लिए प्रिय पर्यटन स्थान बन जाता है
लेह तक पहुंचने की सड़क द्वारा दो मार्ग है जो श्रीनगर कश्मीर से होकर 424 किलोमीटर की दूरी है, जबकि मनाली, रोहतांग, सरचू होकर 474 किलोमीटर की दूरी है. एक मध्य मार्ग भी है जो निर्माणाधीन है. रोहतांग सरचू मार्ग के केय्लोंग होकर गुजरता है, जहाँ पर्वतों का नैसर्गिक सौंदर्य अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता है.जब एक पर्वत श्रृंखला पर स्थित निर्मित सड़क पर चलते हुए आप विपरीत दिशा में अन्य पर्वत श्रेणी के नयनाभिराम दृश्यों का सुख बीच में बहती नदी के साथ लेते हैं. इन पहाड़ों पर किलेनुमा प्राकृतिक रचनाएं भी आपका मन मोह लेती है जो सपाट पर्वत पर संस्कृत की ऋचाएं जैसी प्रतीत होती हैं. सड़क मार्ग से लेह की यात्रा दो से तीन दिनों में पूर्ण की जा सकती है जिससे ऊँचाई पर वायुदाब के विरुद्ध होने के मानव शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव को बहुत हद तक उदासीन कर देता है और आपका शरीर ले तक पहुंचते पहुंचते विरल वायुदाब के अनुरूप ढल जाता है। यदि आप सीधे हवाई यात्रा कर लें पहुंचते हैं तो मैदानी क्षेत्र में रहने वाले यात्रियों को सांस की थकान ऊर्जा की स्वाभाविक समस्या आती है अतः अपने चिकित्सक की सलाह से उचित औषधियों का सेवन करते जाना आपके स्वास्थय को पहाड़ों पर चढाने में स्वस्थ बनाए रखेगा.

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